बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू हुए एक लंबा अरसा बीत चुका है, लेकिन धरातल पर शराब की तस्करी अब एक संगठित और हाई-टेक अपराध का रूप ले चुकी है। पुलिस की नाक के नीचे काली कमाई का एक ऐसा सिंडिकेट चल रहा है जो न सिर्फ सरकार के मंसूबों पर पानी फेर रहा है। बल्कि कानून व्यवस्था के लिए भी बड़ी चुनौती बन गया है।
फर्जी नंबर प्लेट और चोरी की गाड़ियां: तस्करी का नया हथियार...
बिहार में शराब माफिया पुलिस की चेकिंग से बचने के लिए एक नया और बेहद शातिर तरीका निकाला है। अब सूबे में शराब की खेप पहुंचाने के लिए चोरी की गाड़ियों और फर्जी नंबर प्लेटों का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है। यह चौंकाने वाला खुलासा गोपालगंज के एसपी विनय तिवारी के द्वारा की गई है। जहां गोपालपुर थाने की पुलिस ने चोरी की स्कॉर्पियो और फर्जी नंबर प्लेट के साथ शराब बरामद की है। हालांकि पुलिस ने संगठित नेटवर्क के तीन तस्करों को भी गिरफ्तार किया है। जिनकी पहचान फुलवरिया थाना क़े पकौली, नारायण गांव निवासी जैनुल हक क़े पुत्र शहजाद आलम.फैसल रजा हथुआ इमाम हुसैन बड़हरिया, सिवान क़े रूप में की गई है।
पहचान छुपाने का खेल:
शराब के यह सौदागर झारखंड, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे पड़ोसी राज्यों से चोरी की गई लग्जरी कारों, एसयूवी और पिकअप वैन को बेहद सस्ते दामों पर खरीदते हैं और इन गाड़ियों पर बिहार के स्थानीय जिलों की गाड़ियों के नंबर की फर्जी प्लेट लगा दी जाती है। इससे पुलिस की रूटीन चेकिंग और सीसीटीवी कैमरों को आसानी से चकमा दे दिया जाता है।
गाड़ी लावारिस छोड़ने का ट्रेंड:
यदि किसी मोड़ पर पुलिस घेराबंदी करती भी है, तो यह तस्कर गाड़ी को सड़क किनारे छोड़कर फरार हो जाते हैं। गाड़ी चोरी की और फर्जी नंबर की होने के कारण पुलिस के लिए असली सरगना तक पहुंचना बेहद मुश्किल हो जाता है।
'संगठित नेटवर्क' का झाम:
नीचे से ऊपर तक कड़ियां में यह धंधा अब किसी एक-दो व्यक्ति का नहीं, बल्कि एक कॉर्पोरेट स्टाइल में चलने वाला संगठित नेटवर्क बन चुका है। जो पर्दे के पीछे रहकर दूसरे राज्यों से थोक में शराब खरीदने के लिए पैसा लगाते हैं।
लाइनर:
इनका काम सबसे महत्वपूर्ण होता है.. ये तस्करों की गाड़ियों के आगे-आगे बाइक से चलते हैं और पुलिस की हर हलचल, बैरिकेडिंग या गश्त की लाइव लोकेशन लोकल इनपुट मुख्य गाड़ी के ड्राइवर को देते हैं। इन्हें एक ट्रिप के लिए मोटी रकम दी जाती है। इनका काम सिर्फ गाड़ी को सुरक्षित ठिकाने तक पहुंचाना होता है.जो मुख्य स्टॉक से माल निकालकर छोटे-छोटे धंधेबाजों और होम डिलीवरी करने वाले लड़कों तक शराब पहुंचाते हैं।
काली कमाई का 'सिंडिकेट' और बढ़ता ग्राफ...
बिहार में शराब की तस्करी ने एक समानांतर अर्थव्यवस्था खड़ी कर दी है। 300 की बोतल को बिहार के भीतर 1000 से ₹1500 तक में बेचा जाता है। इस भारी मुनाफे के कारण ही अपराधी हर दिन नए-नए हथकंडे अपना रहे हैं।
कड़े कानूनों और लगातार हो रही पुलिस छापेमारी,
ड्रोन सर्विलांस और मद्यनिषेध विभाग की मुस्तैदी के बावजूद, इस 'संगठित नेटवर्क के झाम' को पूरी तरह तोड़ना एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। जब तक फर्जी नंबर प्लेटों और कबाड़/चोरी की गाड़ियों के इस सिंडिकेट पर नकेल नहीं कसी जाएगी, तब तक बॉर्डर इलाकों से लेकर कस्बों तक इस काली कमाई के खेल पर लगाम लगाना मुश्किल होगा।
गोपालगंज से कुमार प्रदीप की रिपोर्ट