लक्ष्य केवल अच्छी शिक्षा नहीं, उत्कृष्टता है, तीसरे टर्म के एमएलसी इंजीनियर सच्चिदानंद राय बने शिक्षक

राजनीति में ऐसे चेहरे कम मिलते हैं, जिनके पास संसाधन भी हों, सत्ता का अनुभव भी हो और इसके बावजूद जमीन से जुड़े रहने की बेचैनी भी बनी रहे। बिहार विधान परिषद के तीसरे टर्म के सदस्य इंजीनियर सच्चिदानंद राय ऐसे ही लोगों में हैं।

सारण: राजनीति में ऐसे चेहरे कम मिलते हैं, जिनके पास संसाधन भी हों, सत्ता का अनुभव भी हो और इसके बावजूद जमीन से जुड़े रहने की बेचैनी भी बनी रहे। बिहार विधान परिषद के तीसरे टर्म के सदस्य इंजीनियर सच्चिदानंद राय ऐसे ही लोगों में हैं।

करोड़ों की संपत्ति और बड़े कारोबारी साम्राज्य के स्वामी होने के बावजूद उनके व्यवहार में उसका जरा भी अहंकार दिखाई नहीं देता। उन्होंने बताया कि पिछले पांच दिनों से उनका अधिकांश समय अपने गांव में स्थापित विद्यालय में बीत रहा है और इन दिनों वे वहां शिक्षक की भूमिका में हैं। वर्ष 2011 में सारण के बनियापुर प्रखंड स्थित अपने गांव लौवा कला में उन्होंने संत जलेश्वर एकेडमी की स्थापना की थी। उद्देश्य साफ था- ग्रामीण इलाके के बच्चों, खासकर बेटियों को बेहतर शिक्षा का अवसर देना। आज यह विद्यालय सीबीएसइ से संबद्ध है और नर्सरी से बारहवीं तक शिक्षा दे रहा है। बड़ी संख्या में बालिकाओं को निःशुल्क शिक्षा भी दी जा रही है।

हालांकि सच्चिदानंद राय यहीं तक नहीं रूकना चाहते हैं। वो कहते हैं, अब लक्ष्य केवल अच्छी शिक्षा देना नहीं, बल्कि उत्कृष्टता हासिल करना है। उनकी इच्छा है कि इस वर्ष दसवीं की परीक्षा में शामिल होने वाले उनके विद्यालय के बच्चों में से कोई सारण जिले में अपनी अलग पहचान बनाए और आने वाले वर्षों में इसी विद्यालय के विद्यार्थी बिहार ही नहीं, राष्ट्रीय स्तर पर Top-10 में स्थान बनाने की क्षमता विकसित करें। इसके लिए उन्होंने खुद मोर्चा संभाल लिया है। पिछले दिनों वे विद्यालय की अलग-अलग कक्षाओं में पीछे बैठकर शिक्षकों को पढ़ाते हुए देख रहे थे। बच्चों से सीधे बातचीत की, उनकी समस्याएं समझीं और जरूरत पड़ने पर खुद भी पढ़ाया। अभिभावकों को बुलाकर पैरेंट टीचर मीटिंग की और उनसे विद्यालय को लेकर उनकी अपेक्षाएं जानीं। उन्होंने बताया कि मैनेजमेंट से लेकर टीचिंग सिस्टम तक में बदलाव शुरू किए गए हैं। योग्य शिक्षकों को जोड़ा जा रहा है। अपने हाल के बंगलुरू दौरे में वह श्री राम ग्लोबल स्कूल के सीइओ से मिलकर स्कूल एजुकेशन, एकेडमिक एक्सीलेंस और मैनेजमेंट की बारीकियों को समझने की कोशिश किए। 

सच्चिदानंद राय के राजनीतिक सफर में भी उतार-चढ़ाव कम नहीं रहे। पिछले कार्यकाल में भाजपा ने उनका टिकट काट दिया था, लेकिन उनकी लोकप्रियता और जनता से जुड़ाव ऐसा था कि उन्होंने चुनाव जीतकर अपनी राजनीतिक ताकत का परिचय दिया। उनकी पहुंच केवल सारण तक सीमित नहीं है। बिहार के अलग-अलग हिस्सों से लोग उनके पास अपनी समस्याएं लेकर पहुंचते हैं और उनकी कोशिश रहती है कि कोई जरूरतमंद उनके दरवाजे से खाली हाथ वापस न लौटे। राजनीति में आने से पहले भी उन्होंने अपने सामाजिक सरोकारों को सिर्फ भाषणों तक सीमित नहीं रखा। ईडेन के माध्यम से छपरा और पटना के लोगों को सरकारी बसों की सुविधा उपलब्ध कराने की पहल हो या शिक्षा के क्षेत्र में अपने गांव में विद्यालय खड़ा करना, उनकी सोच में समाज को कुछ वापस देने का भाव दिखाई देता है। 

इंजीनियर सच्चिदानंद राय कहते हैं, विद्यालय बना देना पर्याप्त नहीं है, उसकी गुणवत्ता की जिम्मेदारी भी किसी को अपने कंधे पर लेनी होगी। अगर शिक्षा के क्षेत्र में कुछ बेहतर करना है तो शुरुआत अपने ही गांव से क्यों न हो? गांव के बच्चों में प्रतिभा की कोई कमी नहीं होती। कमी होती है अवसर की, सही मार्गदर्शन की और उस प्रतिभा पर भरोसा करने वाले हाथों की।सच्चिदानंद राय इन दिनों अपने गांव में वही हाथ बनने की कोशिश कर रहे हैं।एमएलसी की भूमिका में उन्हें बिहार की राजनीति में आपने बहुत देखा होगा, लेकिन आने वाले दिनों में शायद उन्हें एक अलग भूमिका में देखना दिलचस्प होगा- एक शिक्षक के रूप में।

अनूप नारायण सिंह की रिपोर्ट