मीनाक्षी नटराजन को सुप्रीम कोर्ट से झटका, अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट ने ठुकराई याचिका

मीनाक्षी नटराजन को सुप्रीम कोर्ट से झटका, अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट ने ठुकराई याचिका

By : स्वराज पोस्ट | Edited By: Urvashi
Updated at : Jun 12, 2026, 3:35:00 PM

सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन को तत्काल राहत देने से इनकार करते हुए उनकी उस याचिका पर विचार करने से मना कर दिया, जिसमें उन्होंने राज्यसभा चुनाव के लिए अपना नामांकन पत्र खारिज किए जाने को चुनौती दी थी। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत इस तरह के विवादों में हस्तक्षेप का रास्ता सीमित है और चुनाव संबंधी आपत्तियों के लिए वैधानिक उपाय उपलब्ध हैं।

अनुच्छेद 329 का संदर्भ

जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की पीठ ने कहा कि अदालत अनुच्छेद 32 के तहत याचिका सुनना नहीं चाहती। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि आदेश में की गई टिप्पणियां केवल मामले की पृष्ठभूमि समझने के लिए हैं और यदि कोई चुनाव याचिका संबंधित उच्च न्यायालय में दायर की जाती है तो उस पर इन टिप्पणियों का प्रभाव नहीं पड़ेगा।

पीठ ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया कि नामांकन खारिज करने में हुई कथित “स्पष्ट त्रुटियों” को सुधारने के लिए सीधे अनुच्छेद 32 का सहारा लिया जा सकता है। न्यायाधीशों ने कहा कि यदि अदालत ऐसे मामलों में हस्तक्षेप करने लगे और अन्य उम्मीदवारों को चुनाव याचिका के रास्ते पर भेजे, तो यह अनुच्छेद 329 में निहित चुनावी व्यवस्था के ढांचे में एक नया अपवाद जोड़ने जैसा होगा।

कोर्ट ने मिसाल पूछी: ‘ऐसा कोई फैसला दिखाइए’

सुनवाई के दौरान पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता ए.एम. सिंघवी से पूछा कि क्या सुप्रीम कोर्ट ने कभी किसी संसदीय या विधानसभा चुनाव में नामांकन अस्वीकृत होने के चरण पर रिटर्निंग ऑफिसर का आदेश रद्द किया है। अदालत ने कहा कि प्रश्न यह नहीं है कि निर्णय सही था या गलत; मुद्दा यह है कि चुनाव प्रक्रिया शुरू हो जाने के बाद विवाद का निवारण सामान्यतः चुनाव याचिका की प्रक्रिया के माध्यम से होता है।

जस्टिस मिश्रा ने यह भी कहा कि यदि अदालत एक उम्मीदवार के नामांकन को पुनर्जीवित कर दे, तो इससे अनुच्छेद 329 के तहत निर्धारित अधिकार क्षेत्र की संरचना प्रभावित होगी। पीठ ने दोहराया कि अब तक का न्यायिक दृष्टिकोण यह रहा है कि नामांकन अस्वीकृति से जुड़े विवाद चुनावी मंच पर उठाए जाएं।

नटराजन पक्ष की दलीलें

कांग्रेस नेता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ए.एम. सिंघवी और विवेक तन्खा उपस्थित हुए। सिंघवी ने कहा कि उम्मीदवार को चुनाव लड़ने के अवसर से शुरुआत में ही वंचित कर दिया गया है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि केवल नोटिस जारी होना अपने आप में आपराधिक कार्यवाही का वह चरण नहीं है जिसे उम्मीदवार को अलग से स्वीकार करना पड़े।

उनका कहना था कि यदि किसी आपराधिक मामले में कार्यवाही लंबित है तो उम्मीदवार उसका खुलासा कर सकती हैं, लेकिन यहां आरोप तय नहीं हुए हैं। सिंघवी ने चुनाव आयोग के रुख की आलोचना करते हुए कहा कि आयोग के समक्ष विस्तृत दलीलें दी गईं, फिर भी कोई राहत नहीं मिली। उन्होंने यह भी शिकायत की कि मामले का उल्लेख किए जाने के बावजूद चुनाव परिणामों की प्रक्रिया आगे बढ़ा दी गई।

चुनाव आयोग और प्रतिद्वंद्वी पक्ष का रुख

चुनाव आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता डी.एस. नायडू ने पक्ष रखा। प्रतिवादी पक्ष का तर्क था कि उम्मीदवार को अपने खिलाफ लंबित सभी मामलों का खुलासा करना चाहिए, चाहे वे किसी भी अदालत में किसी भी अवस्था में क्यों न हों। उनके अनुसार फॉर्म 26 के क्लॉज 5 में मांगी गई जानकारी को छिपाना नामांकन अस्वीकृति का आधार बन सकता है और रिटर्निंग ऑफिसर ने नियमों के अनुरूप कार्रवाई की।

प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि चुनाव लड़ना मौलिक अधिकार नहीं बल्कि वैधानिक अधिकार है। उन्होंने दलील दी कि जब मौलिक अधिकार का प्रश्न ही नहीं है, तब अनुच्छेद 32 के तहत याचिका सुनना उचित नहीं ठहराया जा सकता। रोहतगी ने अनुच्छेद 329 का हवाला देते हुए कहा कि चुनाव प्रक्रिया में न्यायिक हस्तक्षेप पर संवैधानिक सीमाएं लागू होती हैं।

निर्वाचन अधिकारी ने नटराजन के चुनावी हलफनामे में कथित विसंगतियों का हवाला देते हुए उनका नामांकन पत्र खारिज किया था। इस फैसले के बाद कांग्रेस ने विरोध दर्ज कराया और चुनाव आयोग पर अनुचित कार्रवाई का आरोप लगाया। पार्टी के प्रतिनिधिमंडल ने हाल ही में मुख्य चुनाव आयुक्त से मिलकर मामले पर चिंता भी जताई थी।

अब आगे क्या?

सुप्रीम कोर्ट के आदेश का व्यावहारिक असर यह है कि नटराजन को इस चरण पर शीर्ष अदालत से तत्काल राहत नहीं मिली। अदालत ने संकेत दिया कि यदि नामांकन अस्वीकृति को चुनौती दी जानी है तो उसका उचित मंच चुनाव याचिका की प्रक्रिया होगी, जिसे संबंधित उच्च न्यायालय में उठाया जा सकता है।