बिहार की सियासत में राज्यसभा चुनाव के बाद मची हलचल थमने का नाम नहीं ले रही है। इस बार चर्चा के केंद्र में हैं कांग्रेस विधायक मनोज विश्वास, जिन्होंने महागठबंधन के उम्मीदवार को वोट न देने के अपने फैसले पर खुलकर सफाई दी है। पार्टी से नोटिस मिलने के बावजूद उन्होंने साफ कर दिया है कि उनका कदम किसी व्यक्तिगत विरोध का नहीं, बल्कि सम्मान और सिद्धांतों का मामला है।
मनोज विश्वास ने पहली बार इस पूरे विवाद पर चुप्पी तोड़ते हुए कहा कि यह सिर्फ एक उम्मीदवार के समर्थन या विरोध का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह बिहार प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अस्तित्व और सम्मान से जुड़ा हुआ है। उनका आरोप है कि राज्यसभा उम्मीदवार तय करते समय न तो स्थानीय विधायकों की राय ली गई और न ही प्रदेश के वरिष्ठ नेताओं को भरोसे में लिया गया।
उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि जब प्रदेश नेतृत्व की ही अनदेखी की जाएगी, तो विधायकों से पार्टी लाइन पर चलने की उम्मीद कैसे की जा सकती है। विश्वास का मानना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में हर स्तर पर संवाद और सम्मान जरूरी होता है, लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं हुआ।
पार्टी की ओर से जारी अनुशासनात्मक नोटिस पर प्रतिक्रिया देते हुए मनोज विश्वास ने कहा कि वे पूरी तरह तैयार हैं जवाब देने के लिए। उन्होंने कहा कि वे अपने जवाब में वही बातें दोहराएंगे जो उन्होंने सार्वजनिक रूप से कही हैं—यानी प्रदेश अध्यक्ष और स्थानीय इकाई की अनदेखी। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वे आज भी खुद को कांग्रेसी मानते हैं और पार्टी के साथ ही रहना चाहते हैं।
मनोज विश्वास ने यह भी सवाल उठाया कि आखिर क्यों उम्मीदवार तय करते समय प्रदेश अध्यक्ष को दरकिनार किया गया। उनका कहना है कि यही वजह रही कि 16 मार्च को हुए मतदान के दौरान उन्होंने विरोध का रास्ता अपनाया।
अंत में उन्होंने साफ कर दिया कि वे अपने फैसले पर अडिग हैं। पार्टी चाहे जो कार्रवाई करे, वे उसका सामना करने को तैयार हैं, लेकिन ‘जी-हुजूरी’ की राजनीति से दूर रहेंगे।