बिहार की राजनीति में मकर संक्रांति का दही-चूड़ा भोज अब सिर्फ पर्व नहीं, बल्कि सियासी शक्ति प्रदर्शन और रिश्तों की नब्ज टटोलने का मंच बन चुका है। इस बार चर्चा के केंद्र में रहा जनशक्ति जनता दल के प्रमुख तेज प्रताप यादव का भव्य दही-चूड़ा भोज, जिसने बिहार की सियासत में कई सवाल खड़े कर दिए।
तेज प्रताप यादव के इस आयोजन में राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव और राज्यपाल की मौजूदगी ने इसे खास बना दिया, वहीं एनडीए के दिग्गज नेता—उपमुख्यमंत्री विजय सिन्हा और जेडीयू नेता अशोक चौधरी—भी दही-चूड़ा का स्वाद लेते नजर आए। लेकिन इस पूरे राजनीतिक जमावड़े में सबसे ज्यादा ध्यान खींचा चिराग पासवान और उनकी पार्टी लोजपा (रामविलास) की पूरी तरह गैरहाजिरी ने।
सूत्रों के मुताबिक, तेज प्रताप यादव ने चिराग पासवान से संपर्क साधने की कोशिश की थी, लेकिन बात नहीं बन सकी। इसके बाद यह सवाल उठने लगे कि क्या महुआ विधानसभा सीट पर हार या कोई पुरानी राजनीतिक कड़वाहट इस दूरी की असली वजह है।
इन तमाम अटकलों पर चिराग पासवान ने अपने दही-चूड़ा भोज के दौरान मीडिया से बात करते हुए सफाई दी। तेज प्रताप का फोन कॉल न उठाने के सवाल पर चिराग ने कहा कि व्यस्तता के कारण कई बार कॉल मिस हो जाते हैं। उन्होंने किसी भी तरह की नाराजगी से इनकार करते हुए तेज प्रताप को अपना “छोटा भाई” बताया और मकर संक्रांति की शुभकामनाएं दीं।
तेज प्रताप के भोज में तेजस्वी यादव की गैरमौजूदगी पर चिराग ने इसे पारिवारिक मामला बताते हुए राजनीतिक टिप्पणी से बचते नजर आए। उन्होंने साफ कहा कि जब परिवार के मुखिया लालू यादव स्वयं मौजूद हैं, तो किसी और की उपस्थिति या अनुपस्थिति पर सवाल उठाना जरूरी नहीं।
सबसे दिलचस्प बात यह रही कि तेज प्रताप यादव ने जीतन राम मांझी की ‘हम’ और उपेंद्र कुशवाहा की ‘आरएलएम’ को न्योता दिया, चिराग के चाचा पशुपति पारस भी पहुंचे, लेकिन लोजपा (रामविलास) का कोई नेता या विधायक आमंत्रित नहीं दिखा।
यही वजह है कि दही-चूड़ा की मिठास के बीच बिहार की सियासत में खटास की चर्चाएं अब तेज हो गई हैं।