विधान परिषद में गजब का खेल, एक ही विज्ञापन से 64 की बहाली! टार्गेट सिर्फ सात निजी सचिवों पर, दफ्तर में घुसने पर लगी रोक

बिहार विधान परिषद में नियुक्तियों को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है. पूर्व सभापति अवधेश नारायण सिंह के कार्यकाल में हुई बहाली अब सवालों के घेरे में आ गई है. बड़ी संख्या में कर्मचारियों को परिषद कार्यालय में प्रवेश करने से रोक दिया गया.

बिहार विधान परिषद में नियुक्तियों को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है. पूर्व सभापति अवधेश नारायण सिंह के कार्यकाल में हुई बहाली अब सवालों के घेरे में आ गई है. नए कार्यकारी सभापति डॉ रामवचन राय के सामने मामला पहुंचने के बाद नियुक्ति प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठने लगे हैं. हैरानी की बात यह है कि एक ही विज्ञापन के तहत 64 पदों पर बहाली हुई, लेकिन दोबारा परीक्षा देने का आदेश सिर्फ सात निजी सहायकों को दिया गया. अब इस पूरे मामले ने राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में हलचल मचा दी है.

विवाद के बीच शुक्रवार को बिहार विधान परिषद में एक और घटनाक्रम देखने को मिला. पूर्व सभापति के कार्यकाल में नियुक्त हुए बड़ी संख्या में कर्मचारियों को परिषद कार्यालय में प्रवेश करने से रोक दिया गया. बताया जा रहा है कि दर्जनों कर्मचारी कार्यालय परिसर में जाने की अनुमति नहीं मिलने के बाद विधान परिषद कैंपस में ही मौजूद रहे. ये कर्मचारी पिछले दो से तीन महीने से नियमित रूप से यहां काम कर रहे थे. ऐसे में अचानक प्रवेश रोके जाने से उनके बीच असमंजस की स्थिति पैदा हो गई है.

दरअसल, बिहार विधान परिषद सचिवालय ने 26 नवंबर 2025 को विज्ञापन संख्या 2/25 जारी किया था. इसके तहत कुल 64 विभिन्न पदों पर नियुक्तियां होनी थीं. इनमें निजी सहायक के सात, आशुलिपिक के 12, डाटा एंट्री ऑपरेटर के 35 और निम्न वर्गीय लिपिक के 10 पद शामिल थे. बहाली की प्रक्रिया पूरी होने के बाद सितंबर 2026 में तत्कालीन सभापति अवधेश नारायण सिंह ने सफल अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र जारी कर दिया. नियुक्ति पत्र मिलने के बाद सभी चयनित अभ्यर्थियों ने विधान परिषद सचिवालय में योगदान भी दे दिया. निजी सहायक के सातों चयनित अभ्यर्थियों ने 10 से 12 सितंबर के बीच ज्वाइन किया था. इसके बाद से वे लगातार कार्यालय में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे थे.

इस बीच बिहार विधान परिषद में नेतृत्व परिवर्तन हुआ और अवधेश नारायण सिंह की जगह उपसभापति डाॅ रामवचन राय के पास कार्यकारी सभापति की जिम्मेदारी आ गई. इसके बाद बहाली प्रक्रिया को लेकर नया घटनाक्रम शुरू हुआ. विधान परिषद सचिवालय ने 22 अक्टूबर 2026 को एक नोटिस जारी किया. इसमें सात नवनियुक्त निजी सहायकों को दोबारा परीक्षा देने का निर्देश दिया गया. इन अभ्यर्थियों को 4 नवंबर को री-एग्जाम में शामिल होना था. इस आदेश के सामने आते ही विवाद गहरा गया.

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब एक ही विज्ञापन के तहत 64 पदों पर नियुक्तियां हुईं, तो फिर जांच और दोबारा परीक्षा के दायरे में केवल सात निजी सहायकों को ही क्यों रखा गया? 12 आशुलिपिक, 35 डाटा एंट्री ऑपरेटर और 10 निम्न वर्गीय लिपिक की नियुक्तियों को लेकर फिलहाल ऐसी कोई कार्रवाई सामने नहीं आई है.

विधान परिषद सचिवालय के री-एग्जाम के आदेश को सातों नवनियुक्त निजी सहायकों ने पटना हाईकोर्ट में चुनौती दी है. स्पृहा सिंह और छह अन्य अभ्यर्थियों की ओर से सिविल रिट याचिका (सीडब्ल्यूजेसी संख्या 16927/2026) दाखिल की गई है. इसमें विधान परिषद सचिवालय के सचिव को पक्षकार बनाया गया है. याचिका में 22 अक्टूबर को जारी उस आदेश को चुनौती दी गई है, जिसके तहत 4 नवंबर को दोबारा परीक्षा लेने का निर्देश दिया गया था. इस मामले में 3 नवंबर 2026 को पटना हाईकोर्ट में सुनवाई हुई. सुनवाई के दौरान अदालत ने बिहार विधान परिषद सचिवालय को पूरे मामले में काउंटर एफिडेविट दाखिल करने का निर्देश दिया है. अब इस मामले की अगली सुनवाई 22 दिसंबर 2026 को निर्धारित की गई है.

बिहार विधान परिषद ने विज्ञापन संख्या 2/25 के तहत 7 सितंबर 2026 को आप्त सचिव संवर्ग में सात स्थायी पदों पर नियुक्ति की थी. चयनित अभ्यर्थियों में स्पृहा सिंह, अमन कुमार, नमन राज, अंजली कुमारी आनंद, सुमित राज, गुड़िया कुमारी और शिमरण भारती शामिल हैं. नियुक्ति पत्र मिलने के बाद सभी ने 12 सितंबर 2026 को परिषद सचिवालय में योगदान दिया था.

इस पूरे विवाद ने बिहार विधान परिषद की नियुक्ति प्रक्रिया को कटघरे में खड़ा कर दिया है. अगर बहाली प्रक्रिया में गड़बड़ी की आशंका है तो केवल सात निजी सहायकों को ही दोबारा परीक्षा देने का निर्देश क्यों दिया गया? क्या बाकी 57 पदों पर हुई नियुक्तियों की भी जांच होगी? क्या अन्य चयनित कर्मचारियों को भी री-एग्जाम देना पड़ेगा? और अगर नियुक्ति प्रक्रिया में अनियमितता पाई जाती है तो इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर क्या कार्रवाई होगी?

फिलहाल इन सवालों पर परिषद सचिवालय की ओर से स्थिति स्पष्ट होना बाकी है. वहीं, हाईकोर्ट में मामला पहुंचने और कर्मचारियों को कार्यालय में प्रवेश से रोके जाने के बाद विवाद और गहरा गया है. अब सबकी नजरें 22 दिसंबर को होने वाली अगली सुनवाई और परिषद सचिवालय के जवाब पर टिकी हैं.

अनूप नारायण सिंह की रिपोर्ट