पटना। बिहार की राजनीति में पूर्व सांसद आनंद मोहन जब भी कोई बात कहते हैं, वह चर्चा और विवाद दोनों का विषय बन जाती है। इन दिनों मोतिहारी में दिया गया उनका एक बयान सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल है। कुछ सेकेंड की वीडियो क्लिप को इस तरह प्रसारित किया जा रहा है, मानो उन्होंने बिहार से चुने गए छह राजपूत सांसदों का अपमान किया हो। लेकिन पूरी बात सुनने पर तस्वीर बिल्कुल अलग दिखाई देती है।
मोतिहारी में एक कार्यक्रम के दौरान आनंद मोहन ने सवाल उठाया कि बिहार से राजपूत समाज के छह सांसद लोकसभा पहुंचते हैं, फिर भी केंद्र सरकार में उस समाज को प्रतिनिधित्व क्यों नहीं मिला? इसी क्रम में उन्होंने कहा, "क्या बिहार से जीते छह सांसद इतने अयोग्य हैं कि उन्हें मंत्री नहीं बनाया गया?" उनके समर्थकों का कहना है कि यह सवाल सांसदों की योग्यता पर नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर था। लेकिन सोशल मीडिया पर उनके बयान के एक हिस्से को काटकर इस तरह चलाया गया, जिससे यह संदेश देने की कोशिश हुई कि उन्होंने सांसदों का अपमान किया है।
पटना में लंबे समय बाद हुई मुलाकात और विस्तृत बातचीत में आनंद मोहन ने कहा कि उनकी लड़ाई किसी व्यक्ति या दल से नहीं, बल्कि सम्मान और हिस्सेदारी की लड़ाई है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि लोकतंत्र में अपनी बात रखना बगावत नहीं है और किसी समाज को उसका सम्मान और उचित प्रतिनिधित्व मिले, इसकी मांग करना हर नागरिक का अधिकार है।
आनंद मोहन ने एक बार फिर अपने उस बयान को दोहराया, जिसने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है। उन्होंने कहा, "राजपूत किसी के गुलाम नहीं हैं। जहां सम्मान मिलेगा, राजपूत वहीं खड़े होंगे।" उनके इस बयान को आगामी विधानसभा चुनाव से जोड़कर भी देखा जा रहा है और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि वे अपने समर्थक वर्ग के बीच लगातार संवाद स्थापित कर रहे हैं।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को लेकर दिए गए अपने पुराने बयान पर भी आनंद मोहन कायम हैं। उन्होंने कहा कि जब उन्होंने यह कहा था कि "पूरी तरह फिटफाट नीतीश कुमार को जिंदा दफन कर दिया गया है", तो उनका आशय सिर्फ इतना था कि यदि नीतीश कुमार पूरी तरह सक्षम और सक्रिय हैं, तो फिर ऐसी क्या मजबूरी है कि उन्होंने मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ दी। उनके अनुसार, यह सवाल सिर्फ उनका नहीं, बल्कि बिहार की जनता भी जानना चाहती है।
बातचीत के दौरान आनंद मोहन ने यह दावा भी किया कि बिहार में सवर्ण आयोग के गठन के पीछे उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होंने कहा कि समाज के आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों की समस्याओं को सामने लाने और उन्हें न्याय दिलाने की दिशा में उन्होंने लगातार प्रयास किया है।
जेल से रिहाई के बाद आनंद मोहन लगातार बिहार के विभिन्न जिलों का दौरा कर रहे हैं, समाज के लोगों से संवाद कर रहे हैं और अपने राजनीतिक तथा सामाजिक सरोकारों को नए सिरे से सामने रख रहे हैं। उनके समर्थकों का मानना है कि वे सम्मान, प्रतिनिधित्व और सामाजिक भागीदारी के सवालों को लेकर एक नई बहस खड़ी कर रहे हैं।
फिलहाल, मोतिहारी से उठा उनका बयान बिहार की राजनीति में एक बड़ा सवाल छोड़ गया है—क्या किसी समाज के सम्मान और हिस्सेदारी की मांग करना अपमान है, या लोकतंत्र में अपनी बात रखने का अधिकार?
अनूप नारायण सिंह, वरिष्ठ पत्रकार