3000 फर्जी शिक्षकों से वेतन के 1400 करोड़ वसूले जाएंगे, 12 हजार अब भी रडार पर

बिहार में 10 वर्ष के दौरान 3 हजार शिक्षक फर्जी प्रमाण पत्र के आधार पर सरकारी नौकरी में चयनित हुए। इन शिक्षकों ने नौकरी पाने के लिए फर्जी बीएड, बीए, बीएससी की डिग्री के साथ ही गलत निवास, जाति और आधार कार्ड का इस्तेमाल किया

By : स्वराज पोस्ट | Edited By: Karishma Singh
Updated at : Feb 08, 2026, 11:16:00 AM

बिहार में 10 वर्ष के दौरान 3 हजार शिक्षक फर्जी प्रमाण पत्र के आधार पर सरकारी नौकरी में चयनित हुए। इन शिक्षकों ने नौकरी पाने के लिए फर्जी बीएड, बीए, बीएससी की डिग्री के साथ ही गलत निवास, जाति और आधार कार्ड का इस्तेमाल किया। सरकार ने अब तक इन शिक्षकों ने लगभग 1400 करोड़ रुपए का वेतन भी दिया है। जांच के बाद अब जब फर्जीवाड़ा का पता चला तो इन शिक्षकों पर कार्रवाई की तैयारी है। शिक्षा विभाग कार्रवाई के साथ-साथ इन शिक्षकों को दिया गया 1400 करोड़ रुपए वेतन व्याज सहित वसूलेगा।

फिलहाल प्रथम चरण में 3000 शिक्षक फर्जी मिले है। शिक्षा विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, अभी खेल और बड़ा हो सकता है। फिलहाल 12 हजार शिक्षकों के प्रमाण पत्र संदिग्ध पाए गए हैं, जिनकी गहनता से जांच की जा रही है। ऐसे में जांच के बाद उनके खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी। जांच के दायरे में आए अधिकांश शिक्षक उत्तर प्रदेश, झारखंड, पश्चिम बंगाल, हरियाणा और दिल्ली के रहने वाले बताए जा रहे हैं। जानकारी के मुताबिक बिहार के 76 हजार स्कूलों में 5.50 लाख शिक्षक है। पंचायत स्तर पर बिहार के 38 जिलों में 3.68 लाख नियोजित शिक्षकों की नियुक्ति हुई थी। इस दौरान स्थानीय स्तर पर प्रमाण पत्र की जांच की गई थी। इसकी एक रिपोर्ट तैयार करके मुख्यालय को भेजा गया था। जानकारी के मुताबिक बिहार में 5.80 लाख शिक्षक है।

9 वर्ष के दौरान शिक्षकों के कई बार प्रमाण पत्र की जांच की गई। मौजूदा समय में निगरानी विभाग द्वारा शिक्षकों के प्रमाण पत्र की जांच की जा रही है। कई बार जांच, प्रमाण पत्र के ट्रांसपोर्ट की वजह से कई शिक्षकों के फोल्डर ही गायब हो गए थे। शिक्षा विभाग में नियोजित शिक्षकों के 3.68 लाख फोल्डर जमा हुए थे। निगरानी अन्वेषण ब्यूरो को केवल 280759 फोल्डर प्राप्त हुए है।

शिक्षा विभाग के अधिकारी के मुताबिक बिहार में नियोजित शिक्षक लगभग 18 वर्ष पुराने है। ऐसे में अधिकांश नियोजित शिक्षकों का प्रमाण पत्र 18 से 30 वर्ष पुराना है। पुराने प्रमाण पत्र की वजह से अधिकांश विश्वविद्यालयों में उसका मैन्युअल रिकॉर्ड है। इन रिकॉर्ड की जांच में काफी परेशानी हो रही है। कई राज्यों के विश्वविद्यालय में मैन्युअल रिकॉर्ड खराब हो चुका है।