सुप्रीम कोर्ट का आदेश! विधवा बहू को ससुराल की संपत्ति से भरण-पोषण का अधिकार

सुप्रीम कोर्ट का आदेश! विधवा बहू को ससुराल की संपत्ति से भरण-पोषण का अधिकार

By : स्वराज पोस्ट | Edited By: Urvashi
Updated at : Jan 14, 2026, 3:54:00 PM

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में विधवा बहू के अधिकारों को स्पष्ट करते हुए उसे बड़ी राहत दी है। शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में मनुस्मृति का संदर्भ लेते हुए कहा कि माता-पिता, पत्नी और संतान का परित्याग न करने का सिद्धांत प्राचीन ग्रंथों में भी स्पष्ट रूप से वर्णित है और इसका उल्लंघन दंडनीय माना गया है। इसी आधार पर कोर्ट ने यह माना कि विधवा बहू अपने ससुर की संपत्ति से भरण-पोषण की हकदार है।

मामला इस सवाल से जुड़ा था कि यदि कोई बहू ससुर के जीवित रहते विधवा होती है तो उसे भरण-पोषण मिल सकता है, लेकिन अगर ससुर की मृत्यु के बाद वह विधवा होती है तो क्या उसका यह अधिकार समाप्त हो जाता है। याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई थी कि ससुर के निधन के बाद विधवा बहू का भरण-पोषण का दावा स्वीकार्य नहीं है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया।

जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस एसवीएन भट्टी की पीठ ने स्पष्ट कहा कि पति की मृत्यु के समय के आधार पर विधवा बहुओं के बीच भेद करना न तो तार्किक है और न ही संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप। कोर्ट के अनुसार, चाहे बहू ससुर के जीवनकाल में विधवा हुई हो या उनके निधन के बाद, दोनों स्थितियों में उसे समान रूप से भरण-पोषण का अधिकार प्राप्त है।

अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि संबंधित कानून मृतक हिंदू के आश्रितों के भरण-पोषण की व्यवस्था करता है। मृतक की संपत्ति से उसके सभी कानूनी वारिसों पर यह जिम्मेदारी आती है कि वे उन निर्भर व्यक्तियों की देखभाल करें, जो स्वयं अपना निर्वाह नहीं कर सकते। इस श्रेणी में विधवा बहू भी शामिल है। कोर्ट ने कहा कि यदि पुत्र की मृत्यु हो जाती है और उसकी पत्नी स्वयं या पति द्वारा छोड़ी गई संपत्ति से जीवनयापन करने में असमर्थ है, तो ससुर पर उसका भरण-पोषण करने की नैतिक और धार्मिक जिम्मेदारी बनती है।

पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून इस जिम्मेदारी को किसी भी परिस्थिति में सीमित नहीं करता। अधिनियम में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो यह कहे कि बहू के विधवा होने का समय उसके अधिकारों को प्रभावित करेगा। कोर्ट ने चेतावनी दी कि कानून की संकीर्ण या तकनीकी व्याख्या के आधार पर विधवा बहू को भरण-पोषण से वंचित करना उसे गरीबी, असहायता और सामाजिक हाशिए की ओर धकेल सकता है, जो महिलाओं की गरिमा और सुरक्षा के मूल सिद्धांतों के विपरीत है।

इस फैसले को हिंदू परिवारों में विधवा महिलाओं के अधिकारों को सशक्त करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। अब यह स्पष्ट हो गया है कि विधवा बहू को ससुराल की विरासत में मिली संपत्ति से भरण-पोषण का ठोस और कानूनी संरक्षण प्राप्त है।