'ऑपरेशन सिंदूर' के एक साल पूरे: चार दिन के संघर्ष ने बदल दी भारत की युद्ध और सुरक्षा की रणनीति

'ऑपरेशन सिंदूर' के एक साल पूरे: चार दिन के संघर्ष ने बदल दी भारत की युद्ध और सुरक्षा की रणनीति

By : स्वराज पोस्ट | Edited By: Urvashi
Updated at : May 07, 2026, 10:41:00 AM

आतंकवाद के खिलाफ भारत की सबसे निर्णायक सैन्य कार्रवाइयों में गिने जाने वाले “ऑपरेशन सिंदूर” को एक वर्ष पूरा होने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय सशस्त्र बलों के साहस, समन्वय और प्रतिबद्धता की सराहना की। इस अवसर पर जारी विशेष संदेश में उन्होंने कहा कि यह अभियान देश की सुरक्षा नीति में दृढ़ता और आतंकवाद के प्रति शून्य सहिष्णुता की स्पष्ट मिसाल बनकर सामने आया।

सरकार की ओर से जारी स्मृति प्रतीक में तिरंगे के साथ उभरती केसरिया ज्वाला को शामिल किया गया है, जिसे सेना के त्याग, संकल्प और राष्ट्ररक्षा के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया। इस मौके पर गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और विदेश मंत्री एस. जयशंकर सहित कई वरिष्ठ नेताओं ने भी अभियान को याद किया।

चार दिन का संघर्ष, कई मोर्चों पर चुनौती

पिछले वर्ष छह और सात मई की मध्यरात्रि में शुरू हुआ यह सैन्य अभियान लगभग चार दिनों तक चला था। इस दौरान भारतीय सेना को पश्चिमी सीमा पर लगातार ड्रोन गतिविधियों और हवाई खतरों का सामना करना पड़ा। लेह से लेकर सर क्रीक तक सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट पर थीं। सैन्य अधिकारियों के अनुसार, यह संघर्ष केवल सीमावर्ती कार्रवाई तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके साथ बड़े स्तर पर दुष्प्रचार और सूचना युद्ध भी चलाया गया, जिसका उद्देश्य सेना और आम जनता का मनोबल कमजोर करना था।

विशेषज्ञ मानते हैं कि इस अभियान ने स्पष्ट कर दिया कि भविष्य के युद्ध केवल पारंपरिक हथियारों से नहीं लड़े जाएंगे। साइबर स्पेस, सूचना तंत्र और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित युद्धक रणनीतियां आने वाले समय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।

अभियान में शामिल रहे सेवानिवृत्त एयर कमोडोर गौरव एम त्रिपाठी ने कहा कि इस कार्रवाई ने संयुक्त हवाई शक्ति के महत्व को रेखांकित किया। उनके मुताबिक, भविष्य के किसी भी संघर्ष में सेना, वायुसेना और नौसेना की समन्वित कार्रवाई बेहद आवश्यक होगी।

उन्होंने यह भी बताया कि ड्रोन रोधी तकनीकों को अब और अधिक व्यापक स्तर पर विकसित करने की जरूरत है। भारतीय वायुसेना ने पहले से इस दिशा में निवेश किया है, लेकिन संवेदनशील सैन्य ठिकानों और रणनीतिक क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए इन क्षमताओं का विस्तार करना अनिवार्य होगा।

त्रिपाठी ने एस-400 वायु रक्षा प्रणाली, आकाश मिसाइल और अन्य आधुनिक हथियार प्रणालियों की भूमिका को निर्णायक बताया। उन्होंने कहा कि इन प्रणालियों का उपयोग केवल रक्षा तक सीमित नहीं था, बल्कि इन्हें रणनीतिक तरीके से अलग-अलग स्थानों पर तैनात कर दुश्मन को भ्रमित करने की रणनीति भी अपनाई गई। सैन्य शब्दावली में इसे “कैमोफ्लाज, कंसीलमेंट एंड डिसेप्शन” कहा जाता है।

रणनीतिक संयम से आक्रामक तैयारी की ओर

सेना के पूर्व अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल दुष्यंत सिंह ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर ने भारत की सुरक्षा नीति में बड़ा बदलाव दिखाया है। उनके अनुसार, भारत अब केवल प्रतिक्रिया देने की नीति तक सीमित नहीं है, बल्कि संभावित खतरों के प्रति पहले से सक्रिय तैयारी की दिशा में आगे बढ़ चुका है।

उन्होंने कहा कि इस अभियान ने यह संदेश दिया कि भारत आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई करते समय परमाणु धमकियों से प्रभावित होने वाला नहीं है। भविष्य में किसी भी आतंकी हमले का जवाब पहले की तुलना में अधिक तेजी और सटीकता से दिया जा सकता है।

पहलगाम हमले के बाद शुरू हुआ था अभियान

यह सैन्य कार्रवाई पिछले वर्ष 22 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद शुरू की गई थी। हमले के जवाब में भारतीय सेना ने सात मई को पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में स्थित कई आतंकी ठिकानों पर सटीक हवाई हमले किए थे।

कार्रवाई में बहावलपुर स्थित जैश-ए-मोहम्मद का मुख्यालय, मुरीदके में लश्कर-ए-तैयबा के ठिकाने और पीओके के कई प्रशिक्षण एवं संचालन केंद्रों को निशाना बनाया गया। भारतीय पक्ष के अनुसार, इस अभियान में बड़ी संख्या में आतंकवादी मारे गए।

भारत की कार्रवाई के बाद दोनों देशों के बीच तनाव तेजी से बढ़ा और पाकिस्तान ने जवाबी हमले की कोशिश की। हालांकि भारतीय सेना ने अधिकांश प्रयासों को विफल कर दिया। बाद में दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों के बीच हॉटलाइन वार्ता के बाद 10 मई को सैन्य गतिविधियां रोकने पर सहमति बनी।

सैन्य आधुनिकीकरण की रफ्तार तेज

ऑपरेशन सिंदूर के बाद पिछले एक वर्ष में भारत ने अपनी सैन्य तैयारियों को मजबूत करने की दिशा में कई बड़े कदम उठाए हैं। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, सरकार ने मानव रहित प्लेटफॉर्म, लंबी दूरी के ड्रोन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निगरानी प्रणाली और आधुनिक मिसाइल नेटवर्क के विकास पर विशेष जोर दिया है।

रक्षा मंत्रालय ने हाल के महीनों में कई बड़े रक्षा खरीद प्रस्तावों को मंजूरी दी है। इनमें रूस से अतिरिक्त एस-400 प्रणाली खरीदने की योजना, मध्यम परिवहन विमानों का अधिग्रहण और फ्रांस से 114 राफेल लड़ाकू विमान खरीदने की परियोजना शामिल है।

इसके अलावा भारतीय नौसेना की समुद्री निगरानी और पनडुब्बी रोधी क्षमता बढ़ाने के लिए अमेरिका निर्मित पी8-आई विमानों की खरीद को भी स्वीकृति दी गई है। राफेल विमानों को मेटिओर और स्कैल्प जैसी उन्नत मिसाइलों से लैस किया जाएगा, जिससे उनकी मारक क्षमता और बढ़ेगी।

नौसेना और परमाणु क्षमता को भी मजबूती

भारत अपनी नौसैनिक शक्ति को बढ़ाने के लिए छह आधुनिक स्टील्थ पनडुब्बियों की परियोजना पर भी तेजी से काम कर रहा है। यह परियोजना जर्मनी की टीकेएमएस और मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड के सहयोग से आगे बढ़ाई जा रही है।

इसी वर्ष भारत ने स्वदेशी परमाणु-संचालित बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी आईएनएस अरिदमन को नौसेना में शामिल किया। इससे पहले आईएनएस अरिहंत और आईएनएस अरिघाट जैसी पनडुब्बियां भारत की सामरिक क्षमता को नई मजबूती दे चुकी हैं।

मिसाइल परीक्षणों से बढ़ा रणनीतिक संतुलन

पिछले एक साल में भारत ने अग्नि श्रृंखला की कई मिसाइलों का सफल परीक्षण भी किया। इनमें अग्नि-5 मिसाइल का परीक्षण विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना गया, जिसकी मारक क्षमता लगभग 5,000 किलोमीटर तक बताई जाती है। यह क्षमता भारत की सामरिक पहुंच को एशिया के बड़े हिस्से तक विस्तारित करती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ऑपरेशन सिंदूर केवल एक सैन्य अभियान नहीं था, बल्कि उसने भारत की रक्षा नीति, युद्ध रणनीति और तकनीकी प्राथमिकताओं को नई दिशा दी है। आतंकवाद के खिलाफ जवाबी कार्रवाई से आगे बढ़कर यह अभियान भविष्य की बहु-क्षेत्रीय युद्ध तैयारी का संकेत भी बन गया है।