जल-जंगल-जमीन की लड़ाई के योद्धा दिशोम गुरु को मरणोपरांत पद्मभूषण, पत्नी रूपी सोरेन लेंगी पुरस्कार

जल-जंगल-जमीन की लड़ाई के योद्धा दिशोम गुरु को मरणोपरांत पद्मभूषण, पत्नी रूपी सोरेन लेंगी पुरस्कार

By : स्वराज पोस्ट | Edited By: Urvashi
Updated at : Jun 23, 2026, 10:11:00 AM

झारखंड आंदोलन के अग्रणी नेता और झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के संस्थापक शिबू सोरेन को मरणोपरांत देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मभूषण से सम्मानित किया जाएगा। मंगलवार, 23 जून को राष्ट्रपति भवन में आयोजित समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू यह सम्मान प्रदान करेंगी। दिवंगत नेता की ओर से उनकी पत्नी रूपी सोरेन पुरस्कार ग्रहण करेंगी।

केंद्र सरकार ने 25 जनवरी को वर्ष 2026 के पद्म पुरस्कारों की घोषणा की थी। शिबू सोरेन को लोकसेवा और समाज के वंचित वर्गों, विशेषकर आदिवासी समुदाय के अधिकारों के लिए लंबे समय तक किए गए योगदान के सम्मान में पद्मभूषण के लिए चुना गया है।

11 जनवरी 1944 को वर्तमान झारखंड के रामगढ़ जिले के नेमरा गांव में जन्मे शिबू सोरेन का शुरुआती जीवन संघर्षों से भरा रहा। किशोरावस्था में ही पिता सोबरन सोरेन की हत्या ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। इस घटना के बाद उन्होंने ग्रामीणों और आदिवासियों के शोषण के खिलाफ अभियान शुरू किया तथा साहूकारों और महाजनों के अत्याचारों का खुलकर विरोध किया।

उनके प्रयासों से अनेक ग्रामीणों को अपनी जमीन वापस दिलाने में मदद मिली। इसी जनसंघर्ष ने उन्हें लोगों के बीच "गुरुजी" के रूप में पहचान दिलाई। संथाल परगना क्षेत्र में उनका प्रभाव लगातार बढ़ा और बाद में उन्हें सम्मानपूर्वक "दिशोम गुरु" कहा जाने लगा।

अलग झारखंड आंदोलन के प्रमुख चेहरा

शिबू सोरेन ने 1970 के दशक में झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना कर अलग राज्य की मांग को संगठित राजनीतिक स्वर दिया। उन्होंने जल, जंगल और जमीन से जुड़े अधिकारों के साथ-साथ आदिवासी अस्मिता, किसानों, मजदूरों और वंचित समुदायों के मुद्दों को लगातार राष्ट्रीय स्तर पर उठाया।

साल 2000 में झारखंड राज्य के गठन की प्रक्रिया में उनके नेतृत्व और झामुमो के आंदोलन को महत्वपूर्ण माना जाता है। उन्होंने जनआंदोलन को गांवों और सड़कों से निकालकर संसद तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई।

चार दशकों से अधिक समय तक सक्रिय राजनीति में रहने वाले शिबू सोरेन ने विधायक, सांसद, केंद्रीय मंत्री और मुख्यमंत्री जैसी कई जिम्मेदारियां निभाईं। वे वर्ष 2005, 2008 तथा 2009 में तीन अलग-अलग कार्यकाल में झारखंड के मुख्यमंत्री बने। हालांकि गठबंधन की परिस्थितियों के कारण उनके कार्यकाल अपेक्षाकृत छोटे रहे।

लोकसभा में उन्होंने दुमका का आठ बार प्रतिनिधित्व किया और राज्यसभा के सदस्य भी रहे। इसके अलावा केंद्र सरकार में उन्हें तीन अलग-अलग अवसरों पर कोयला मंत्री की जिम्मेदारी सौंपी गई। संसद और जनसभाओं दोनों में उनकी पहचान आदिवासी समाज के मुखर प्रतिनिधि और बेबाक नेता के रूप में रही।

जननेता के रूप में विरासत

शिबू सोरेन का निधन वर्ष 2025 में 81 वर्ष की आयु में हुआ था। उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में आदिवासी अधिकारों, सामाजिक न्याय और क्षेत्रीय पहचान के मुद्दों को लगातार केंद्र में रखा। मरणोपरांत पद्मभूषण से सम्मानित किया जाना उनके लंबे सार्वजनिक जीवन और झारखंड आंदोलन में निभाई गई ऐतिहासिक भूमिका की राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण स्वीकार्यता माना जा रहा है।