नक्सलवाद के खिलाफ निर्णायक बढ़त, 11 साल में सिमटा ‘लाल गलियारा’, 2026 तक पूर्ण मुक्ति का लक्ष्य

नक्सलवाद के खिलाफ निर्णायक बढ़त, 11 साल में सिमटा ‘लाल गलियारा’, 2026 तक पूर्ण मुक्ति का लक्ष्य

By : स्वराज पोस्ट | Edited By: Urvashi
Updated at : Dec 15, 2025, 2:19:00 PM

केंद्र सरकार की सख्त और समन्वित वामपंथी उग्रवाद विरोधी नीति के चलते देश में नक्सल प्रभावित इलाकों का दायरा ऐतिहासिक रूप से सिमट गया है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2014 में जहां 36 जिले ‘अत्यधिक नक्सल प्रभावित’ श्रेणी में आते थे, वहीं 2025 तक यह संख्या घटकर केवल तीन रह गई है। इसी तरह कुल नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या 126 से घटकर अब सिर्फ 11 रह गई है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि मार्च 2026 तक हर प्रभावित क्षेत्र को पूरी तरह नक्सल मुक्त बनाने का लक्ष्य तय किया गया है।

बिखरे प्रयासों से संगठित रणनीति तक

पिछली सरकारों के असंगठित दृष्टिकोण के विपरीत, मौजूदा सरकार ने नक्सलवाद से निपटने के लिए एक स्पष्ट और बहुआयामी रणनीति अपनाई। संवाद, सुरक्षा और समन्वय—इन तीन स्तंभों पर आधारित इस नीति ने न केवल हिंसा को नियंत्रित किया, बल्कि उग्रवादी नेटवर्क की रीढ़ भी तोड़ दी।

नक्सलवाद की पृष्ठभूमि

नक्सल आंदोलन की जड़ें वर्ष 1967 के नक्सलबाड़ी आंदोलन से जुड़ी हैं, जो बाद में तथाकथित ‘लाल गलियारे’ के रूप में कई राज्यों तक फैल गया। छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, मध्य प्रदेश, केरल और पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्से दशकों तक इसकी चपेट में रहे। माओवादी संगठन खुद को हाशिए पर खड़े समुदायों का रक्षक बताते रहे, लेकिन व्यवहार में उनकी गतिविधियां हिंसा, डर और जबरन वसूली तक सीमित रहीं।

एक दशक में हिंसा का तेज़ पतन

सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 2004–2014 की तुलना में 2014–2024 के बीच नक्सली हिंसा की घटनाओं में 53 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। इसी अवधि में सुरक्षा बलों के जवानों की मौतों में 73 प्रतिशत और नागरिक हताहतों में करीब 70 प्रतिशत की कमी आई है। इसे सरकार अपनी रणनीति की सबसे बड़ी उपलब्धि मान रही है।

हालिया अभियानों की बड़ी सफलताएं

वर्ष 2024 और 2025 नक्सल विरोधी अभियानों के लिहाज से निर्णायक रहे। 2025 में अब तक 317 नक्सली मारे गए, 862 गिरफ्तार हुए और लगभग 2,000 ने आत्मसमर्पण किया। अकेले 2024 में 290 उग्रवादी ढेर किए गए और 1,090 गिरफ्तार हुए। दोनों वर्षों में कुल 28 शीर्ष नक्सली नेताओं का अंत हुआ, जिनमें केंद्रीय समिति के सदस्य भी शामिल हैं।

ऑपरेशन ‘ब्लैक फॉरेस्ट’: निर्णायक मोड़

छत्तीसगढ़ के नारायणपुर में चलाया गया ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट नक्सलवाद के खिलाफ अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाइयों में शामिल है। इस अभियान में 27 कुख्यात माओवादियों को मार गिराया गया, जिनमें सीपीआई-माओवादी के महासचिव नंबाला केशव राव उर्फ बसवराजू भी शामिल थे। तीन दशकों में यह पहला मौका था जब महासचिव स्तर का नेता सुरक्षा बलों के अभियान में ढेर हुआ।

सुरक्षा घेरा और आधारभूत ढांचा

नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा ढांचे का अभूतपूर्व विस्तार किया गया है। जहां 2014 तक केवल 66 किलेबंद पुलिस स्टेशन थे, वहीं 2025 तक इनकी संख्या बढ़कर 586 हो गई। बीते छह वर्षों में 361 नए सुरक्षा शिविर और 68 रात्रिकालीन हेलीपैड बनाए गए, जिससे दुर्गम इलाकों तक पहुंच आसान हुई।

नक्सली वित्त पोषण पर करारा प्रहार

नक्सलियों की आर्थिक कमर तोड़ने के लिए एनआईए में विशेष इकाई गठित की गई। इस इकाई और अन्य एजेंसियों की कार्रवाई में 90 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति जब्त या कुर्क की गई। सरकार का मानना है कि इससे शहरी नक्सल नेटवर्क को भी गहरा झटका लगा है।

राज्यों की क्षमता में निवेश

केंद्र ने सुरक्षा और ढांचागत योजनाओं के जरिए नक्सल प्रभावित राज्यों को बड़े पैमाने पर संसाधन मुहैया कराए। सुरक्षा संबंधी व्यय, विशेष ढांचागत योजनाओं और केंद्रीय सहायता के तहत हजारों करोड़ रुपये जारी किए गए। इसके अलावा, सड़क निर्माण और मोबाइल नेटवर्क विस्तार पर विशेष जोर दिया गया, जिससे पहले कटे-छंटे इलाकों में संपर्क बहाल हुआ।

तीन मोर्चों पर प्रगति : सड़क, मोबाइल और बैंक 

2014 के बाद नक्सल प्रभावित इलाकों में 12,000 किलोमीटर से अधिक सड़कों का निर्माण हुआ। हजारों मोबाइल टावरों के जरिए 2जी और 4जी नेटवर्क का विस्तार किया गया। साथ ही, हजारों बैंक शाखाएं, एटीएम और डाकघर खोलकर दूरस्थ इलाकों को औपचारिक अर्थव्यवस्था से जोड़ा गया। 48 नक्सल प्रभावित जिलों में आईटीआई और कौशल विकास केंद्र स्थापित किए गए, जिससे स्थानीय युवाओं को प्रशिक्षण और रोजगार के अवसर मिले। सरकार का दावा है कि इससे नक्सली संगठनों में नई भर्ती की गति धीमी पड़ी है। आकर्षक आत्मसमर्पण नीति के तहत उग्रवादियों को आर्थिक सहायता, प्रशिक्षण और रोजगार की गारंटी दी जा रही है। इसी का नतीजा है कि सैकड़ों नक्सलियों ने हथियार छोड़कर सामान्य जीवन अपनाया है।

पिछले 11 वर्षों में अपनाई गई सुनियोजित सुरक्षा कार्रवाई, आर्थिक दबाव, तेज़ विकास और पुनर्वास नीति के चलते नक्सलवाद अब अपने अंतिम चरण में पहुंचता दिख रहा है। भले ही कुछ दुर्गम इलाकों में चुनौती शेष हो, लेकिन सरकार का दावा है कि नक्सली आंदोलन की वैचारिक और भौगोलिक पकड़ टूट चुकी है। यदि मौजूदा गति बनी रही, तो मार्च 2026 तक देश के नक्सल प्रभावित नक्शे का पूरी तरह बदल जाना तय माना जा रहा है।