मजबूत बुनियाद के बावजूद मुद्रा कमजोर, आर्थिक सर्वेक्षण ने रुपये की चुनौती को किया उजागर

मजबूत बुनियाद के बावजूद मुद्रा कमजोर, आर्थिक सर्वेक्षण ने रुपये की चुनौती को किया उजागर

By : स्वराज पोस्ट | Edited By: Urvashi
Updated at : Jan 29, 2026, 4:29:00 PM

आर्थिक सर्वेक्षण 2026 में भारत की अर्थव्यवस्था की स्थिति को सुदृढ़ बताया गया है, लेकिन इसके साथ ही यह भी रेखांकित किया गया है कि वर्ष 2025 के दौरान भारतीय रुपये का प्रदर्शन उम्मीदों पर खरा नहीं उतर सका। सर्वेक्षण के अनुसार, रुपये की मौजूदा विनिमय दर देश की वास्तविक आर्थिक क्षमता और मजबूती को पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं करती।

कमजोर रुपया, लेकिन फिलहाल बड़ा खतरा नहीं

रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्तमान में कमजोर रुपया तत्काल रूप से नुकसानदेह नहीं माना जा रहा है। उलटे, इससे भारतीय निर्यातकों को अमेरिकी टैरिफ के प्रभाव से आंशिक राहत मिली है। इसके साथ ही कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें स्थिर रहने से आयातित महंगाई का जोखिम भी सीमित बना हुआ है।

मजबूत आर्थिक संकेतकों के बावजूद दबाव

आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक भारत की विकास दर ऊंची बनी हुई है, महंगाई नियंत्रण में है, बैंकिंग तंत्र स्थिर है और कॉरपोरेट क्षेत्र की वित्तीय स्थिति संतोषजनक है। इसके बावजूद रुपये पर दबाव देखा गया, जो यह संकेत देता है कि मुद्रा बाजार में अन्य बाहरी और संरचनात्मक कारक प्रभावी भूमिका निभा रहे हैं।

निवेशकों के भरोसे पर नजर

सर्वेक्षण में आगाह किया गया है कि कमजोर रुपया विदेशी निवेशकों के लिए चिंता का विषय बन सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में निवेश को लेकर वैश्विक निवेशकों के बीच सतर्कता बढ़ी है और आने वाले समय में उनके भरोसे को बनाए रखना एक अहम चुनौती होगा।

व्यापार घाटा और विदेशी पूंजी की जरूरत

भारत को वस्तुओं के व्यापार में लगातार घाटे का सामना करना पड़ता है। सेवाओं के निर्यात और विदेशों से आने वाले धन से मिलने वाला अधिशेष इस कमी को पूरी तरह संतुलित नहीं कर पाता। ऐसे में भुगतान संतुलन को स्थिर रखने के लिए देश को विदेशी पूंजी प्रवाह पर निर्भर रहना पड़ता है। यदि यह प्रवाह कमजोर पड़ता है, तो रुपये पर सीधा दबाव पड़ता है।

ऐतिहासिक निचले स्तर पर मुद्रा

गुरुवार को भारतीय रुपया अपने अब तक के सबसे कमजोर स्तर पर पहुंच गया। विदेशी निवेश में लगातार कमी और कंपनियों द्वारा जोखिम से बचाव के लिए किए गए उपायों के चलते मुद्रा पर दबाव और बढ़ गया। इस दौरान रुपया 92 के अहम स्तर से नीचे फिसल गया।

गिरावट थामने के लिए आरबीआई की कार्रवाई

बाजार से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, भारतीय रिजर्व बैंक ने रुपये में तेज गिरावट को रोकने के लिए बाजार में हस्तक्षेप किया। केंद्रीय बैंक ने दोहराया है कि उसका उद्देश्य किसी निश्चित विनिमय दर को बनाए रखना नहीं, बल्कि अत्यधिक उतार-चढ़ाव को सीमित करना है।

वैश्विक अनिश्चितताओं का असर

अमेरिकी टैरिफ, विदेशी पोर्टफोलियो निवेश की निकासी, सोने के आयात में वृद्धि और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं ने रुपये पर दबाव बढ़ाया है। यह सब ऐसे समय में हो रहा है, जब भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और हाल ही में यूरोपीय संघ के साथ मुक्त व्यापार समझौता भी किया गया है।