भूख-गरीबी, भैंस की पीठ, दूध बेचना...किस्मत ने ली करवट, आज खेसारी जिस चीज को छू दें, वह सोना हो जाए

भूख और गरीबी आदमी को बहुत कुछ सिखाती है। कुछ लोग उसके आगे हार जाते हैं और कुछ उसी को अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लेते हैं। छपरा की मिट्टी से निकले खेसारी लाल यादव की कहानी भी ऐसी ही मिट्टी, पसीने, भूख और संघर्ष की कहानी है।

भूख और गरीबी आदमी को बहुत कुछ सिखाती है। कुछ लोग उसके आगे हार जाते हैं और कुछ उसी को अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लेते हैं। छपरा की मिट्टी से निकले खेसारी लाल यादव की कहानी भी ऐसी ही मिट्टी, पसीने, भूख और संघर्ष की कहानी है। यह उस कलाकार की कहानी है जो कभी भैंस की पीठ पर बैठकर खेतों में बिरहा का तान छेड़ता था और नहीं जानता था कि एक दिन उसकी आवाज भोजपुरी मनोरंजन की दुनिया में इतनी दूर तक जाएगी कि वह जिस चीज को छुएगा, वही सोना बनती चली जाएगी। 

रसूलपुर चट्टी से आगे बढ़िए। पकवा इनार की तरफ जाने वाली सड़क पर गांवों की वही पुरानी गंध मिलेगी—मिट्टी, खेत, पशु और देहाती जीवन की सादगी। इसी इलाके में कमल बाबा की कीर्तन मंडली हुआ करती थी। पकवा इनार के रहने वाले कमल बाबा की मंडली में एक दुबला-पतला, घुंघराले बालों वाला लड़का झाल बजाता था। नाम था सत्रोहन। भोजपुरी इलाके में नाम भी अपनी यात्रा करते हैं। शत्रुघ्न, सत्रोहन बन जाता है। वही सत्रोहन आगे चलकर खेसारी बना। कहते हैं, कमल बाबा ने ही उसे यह नाम दिया था।आज जिस धनाडीह गांव का नाम भोजपुरी के नक्शे पर चमकता है, वहां तब जिंदगी इतनी चमकदार नहीं थी। मंच बनाना भी अपने आप में एक बड़ा खर्च था। 

छपरा के गांवों में कार्यक्रम होते तो कई बार कलाकारों के लिए बाकायदा मंच नहीं बनता था। चौकी जोड़कर उसी पर कलाकार नाचते-गाते थे। हमने खुद खेसारी वाला कार्यक्रम खूब देखा है, लेकिन उस समय लोग अपनी चौकी देने से भी कतराते थे। डर रहता था कि कलाकार कूदते-नाचते हैं, कहीं चौकी टूट गई तो आज उसी खेसारी के कार्यक्रम में हजारों लाखों की भीड़ उमड़ती है। लेकिन उस दौर में कलाकारों को अपनी जगह बनाने के लिए जमीन पर ही लड़ना पड़ता था।

उस समय मनोरंजन के बड़े साधन थे—कीर्तन मंडलियां और लौंडा नाच। फिर धीरे-धीरे जनता बाजार और आसपास के इलाकों में आर्केस्ट्रा का दौर आया। भोजपुरी गायक का गीत अगर आर्केस्ट्रा में खूब बज गया तो मानिए वह हिट हो गया। इसी दौर में कमला बाबा की भजन मंडली का वह दुबला-पतला लड़का अचानक अलग रास्ते पर निकल पड़ा। उसने चटपटे, मसालेदार गीत गाए। ‘सानिया मिर्जा’ जैसे गीतों ने उसे रातों-रात पहचान दे दी। गीत चले तो स्टेज शो मिलने लगे। स्टेज मिला तो अपनी मंडली बनी और फिर धीरे-धीरे सत्रोहन, खेसारी के नाम से पहचाना जाने लगा। 

लेकिन सत्रोहन से खेसारी बनने की यह कहानी अकेले की कहानी नहीं है। उस शुरुआती दौर में उसके साथ कई लोग थे। ऐसे लोग जिन्होंने रात-रात भर जागकर उसके लिए सपने देखे। ऐसे चेहरे जिन्होंने उसके संघर्ष के दिनों में उसका साथ दिया। समय आगे बढ़ा तो कुछ लोग पीछे छूटते चले गए। उस दौर में खेसारी के मैनेजर के रूप में सुबोध नाम का एक लड़का था। आज वह सिलीगुड़ी में फल और सब्जी बेचता है। 

डुमरसन बाजार में लकड़ी मिल चलाने वाले एक व्यक्ति के यहां इन लोगों की बैठकी हुआ करती थी। सपने वहीं बनते थे, योजनाएं वहीं बनती थीं और भोजपुरी के उस उभरते कलाकार को लेकर उम्मीदें भी वहीं पलती थीं। फिर आया वह मोड़ जिसने खेसारी की जिंदगी बदल दी। 

बलिया के आलोक कुमार सिंह ने उसे फिल्मों में पहला बड़ा मौका दिया। ‘साजन चले ससुराल’ आई और खेसारी की किस्मत ने करवट ले ली। आज जिन कलाकारों की सफलता देखकर लोग पूछते हैं कि आखिर उन्हें मौका कैसे मिला, वैसा सवाल उस समय खेसारी को लेकर भी था। लेकिन एक फर्क था—उसके गीत चल रहे थे। गीतों की लोकप्रियता ने पैसे का रास्ता खोला और पैसे ने आगे बढ़ने का रास्ता। फिर स्टेज, गीत, फिल्म और बाजार—सब धीरे-धीरे एक-दूसरे से जुड़ते चले गए। 

छपरा की भोजपुरी गायकी का अपना अलग मिजाज है। यहां सुर से ज्यादा भाव की प्रधानता रही है। गंगा पार कर आरा-भोजपुर की तरफ जाइए तो तस्वीर थोड़ी बदल जाती है। वहां भाव के साथ सुर की भी अपनी मजबूत भूमिका है।खेसारी के लिए उस दौर के सारण के दो गायकों ने अलग तरह की जमीन तैयार की—गुड्डू रंगीला और राधेश्याम रसिया। फिर सानिया और कलुआ जैसे नाम आए। भोजपुरी के एक दौर में इन कलाकारों ने अश्लीलता की सीमाओं को जिस तरह धक्का दिया, उसने आगे आने वाली पीढ़ी के लिए एक अलग बाजार तैयार कर दिया। बाद में कई नए गायकों ने उन्हीं पुराने अश्लील गीतों की ऐसी-ऐसी पैरोडी गाईं, जिन्हें सभ्य शब्दों में लिखना भी मुश्किल है। 

लेकिन इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा अश्लील गीत नहीं, बल्कि वह लड़का है जो कभी कमल बाबा की मंडली में झाल बजाता था। वह लड़का जिसने गरीबी देखी। वह लड़का जिसने चौकी को मंच बनाया। वह लड़का जिसके कार्यक्रम के लिए लोग अपनी चौकी तक देने में डरते थे। वह लड़का जो खेतों में भैंस की पीठ पर बैठकर बिरहा का तान छेड़ता था। वही लड़का आगे चलकर भोजपुरी सिनेमा के सबसे बड़े नामों में शामिल हुआ। सफलता की कहानी अक्सर मंच की रोशनी में दिखाई जाती है। लेकिन असली कहानी मंच के पीछे छूटे अंधेरे में लिखी जाती है। 

खेसारी की कहानी भी उन अनगिनत चेहरों, रातों, चौकियों, गांवों, आर्केस्ट्रा और संघर्षों से होकर निकली है, जिन्हें आज की चकाचौंध में याद करना मुश्किल है। सत्रोहन से खेसारी बनने तक बहुत कुछ बदला। गांव वही रहे, मिट्टी वही रही, लेकिन उस मिट्टी से निकला कलाकार बदल गया। और शायद किस्मत का सबसे खूबसूरत खेल यही है—जिस कलाकार के लिए कभी मंच नहीं मिलता था, एक दिन वही कलाकार इतना बड़ा मंच बन जाता है कि पूरी इंडस्ट्री उस पर खड़ी दिखाई देती है।

धनाडीह का वह लड़का तब नहीं जानता था कि उसके हिस्से में क्या लिखा है।उसे सिर्फ इतना पता था कि पेट के लिए गाना है, जिंदगी के लिए लड़ना है और भीड़ के बीच अपनी आवाज पहचान बनानी है। बाकी कहानी किस्मत ने लिखी। और जब किस्मत ने करवट ली तो सत्रोहन, खेसारी बन गया।फिर भोजपुरी की दुनिया में जैसे एक कहावत सच होती चली गई—खेसारी जिस चीज को छू दें, वह सोना हो जाए।

अनूप नारायण सिंह