झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने खरसावां गोलीकांड से जुड़े शहीदों को इतिहास की गुमनामी से बाहर लाने का संकल्प दोहराया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार शहीदों की पहचान सुनिश्चित कर उनके आश्रितों को सम्मान और अधिकार दिलाने के लिए जल्द ही एक विशेष कमेटी बनाएगी। इसके साथ ही पूरे मामले की निष्पक्ष पड़ताल के लिए न्यायिक जांच आयोग के गठन का भी निर्णय लिया गया है।
गुरुवार को मुख्यमंत्री खरसावां स्थित शहीद स्थल पहुंचे, जहां उन्होंने शहीदों को श्रद्धासुमन अर्पित किए। इस दौरान उन्होंने हेलीपैड पर गार्ड ऑफ ऑनर लेने से इनकार करते हुए सीधे स्मारक स्थल पर जाकर श्रद्धांजलि देना चुना। मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार का लक्ष्य है कि अगले शहीद दिवस से पहले सभी शहीदों की पहचान कर उन्हें पूरा सम्मान दिया जाए।
मीडिया से बातचीत और जनसभा को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि भले ही एक जनवरी को दुनिया नया साल मनाती हो, लेकिन झारखंड के आदिवासी, मूलवासी, किसान और मजदूर समाज के लिए यह दिन शहीद दिवस के रूप में जुड़ा है। जब अन्य स्थानों पर उत्सव होता है, तब झारखंड के लोग अपने बलिदानियों को याद करते है; यही राज्य की पहचान और ऐतिहासिक चेतना है।
उन्होंने कहा कि झारखंड का इतिहास संघर्ष, प्रतिरोध और बलिदान की कहानियों से भरा हुआ है। कोल्हान, संताल परगना, छोटानागपुर या पलामू; हर क्षेत्र में जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए लोगों ने कुर्बानी दी है। चाहे औपनिवेशिक शासन रहा हो या उसके बाद का दौर, यहां के लोगों ने अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई है। खरसावां गोलीकांड इसी संघर्ष की एक दर्दनाक और बड़ी मिसाल है।
मुख्यमंत्री सोरेन ने बताया कि सरकार ने शहीदों की खोज और सम्मान से जुड़ा एक प्रारूप तैयार कर लिया है, जिसे सभी पहलुओं से संतुष्ट होने के बाद लागू किया जाएगा। न्यायिक जांच आयोग में सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को शामिल किया जाएगा, ताकि किसी शहीद या उनके परिवार के साथ किसी तरह का अन्याय न हो। उन्होंने दोहराया कि सरकार केवल श्रद्धांजलि तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि शहीद परिवारों के सम्मान और अधिकारों के प्रति भी प्रतिबद्ध है।
इस अवसर पर मंत्री दीपक बिरुआ, सिंहभूम की सांसद जोबा मांझी, खरसावां विधायक दशरथ गागराई और ईचागढ़ विधायक सविता महतो सहित कई जनप्रतिनिधि उपस्थित थे। शहीद स्मारक समिति ने मुख्यमंत्री का स्वागत किया।
सभा को संबोधित करते हुए विधायक दशरथ गागराई ने कहा कि खरसावां गोलीकांड स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े गोलीकांडों में गिना जाता है। आजादी के महज साढ़े चार महीने बाद, जब देश नए साल के उत्सव में डूबा था, तब आदिवासियों पर गोलियां बरसाई गईं। तभी से आदिवासी समाज एक जनवरी को शोक दिवस के रूप में मनाता आ रहा है। उन्होंने मांग की कि शहीदों की पहचान की प्रक्रिया दोबारा शुरू की जाए और झारखंड के बाहर से आए शहीदों को भी समान सम्मान दिया जाए।
गौरतलब है कि 1 जनवरी 1948 को खरसावां को ओडिशा में शामिल करने के फैसले के विरोध में बड़ी संख्या में आदिवासी खरसावां हाट बाजार में एकत्र हुए थे। इसी दौरान पुलिस की गोलीबारी में कई निर्दोष लोगों की जान चली गई। इस घटना को जलियांवाला बाग के बाद देश का दूसरा सबसे बड़ा गोलीकांड माना जाता है। तभी से हर साल एक जनवरी को खरसावां में शहीद दिवस मनाकर शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाती है।