मेयर सीटों पर बागियों की जीत ने बिगाड़ा गणित, अब ‘बीती ताहि बिसारिए’ की राह पर भाजपा

मेयर सीटों पर बागियों की जीत ने बिगाड़ा गणित, अब ‘बीती ताहि बिसारिए’ की राह पर भाजपा

By : स्वराज पोस्ट | Edited By: Urvashi
Updated at : Mar 02, 2026, 4:55:00 PM

झारखंड के नगर निकाय चुनावों ने बीजेपी संगठन को अंदरूनी स्तर पर बड़ा संदेश दिया है। पार्टी समर्थित उम्मीदवारों के खिलाफ कई स्थानों पर बागी नेताओं के मैदान में उतरने से चुनावी समीकरण बिगड़ गए। नतीजों के बाद अब पार्टी का रुख पहले से कहीं अधिक नरम दिखाई दे रहा है। संकेत मिल रहे हैं कि नेतृत्व टकराव को विराम देकर संगठनात्मक एकजुटता की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है।

चुनाव परिणाम सामने आते ही कई जिलों में दिलचस्प तस्वीरें दिखीं। जहां पहले बगावत को अनुशासनहीनता माना जा रहा था, वहीं जीत दर्ज करने वाले कुछ नेताओं का स्थानीय जिलाध्यक्षों ने माला पहनाकर स्वागत किया। प्रदेश महामंत्री प्रदीप वर्मा ने भी सोशल मीडिया के जरिए विजयी उम्मीदवारों को बधाई दी। धनबाद में मेयर पद पर जीत हासिल करने वाले संजीव सिंह को शुभकामनाएं देने स्वयं बीजेपी विधायक राज सिन्हा पहुंचे। संजीव सिंह के हाथों मिठाई खाते उनकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर खूब साझा की गईं।

क्या समाप्त होगा विवाद?

इन घटनाओं से यह चर्चा तेज हो गई है कि पार्टी इस पूरे प्रकरण को यहीं समाप्त करना चाहती है। हालांकि, यह अब तक स्पष्ट नहीं है कि राहत केवल विजयी बागियों को मिलेगी या उन सभी को, जिन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था। पार्टी के पदाधिकारी इस मुद्दे पर खुलकर कुछ भी कहने से बच रहे हैं, लेकिन संगठन के भीतर मंथन जारी है। सूत्रों का कहना है कि अब “बीती ताहि बिसारिए” की नीति अपनाने पर विचार हो रहा है।

शो-कॉज नोटिस की लंबी सूची

प्रदेश महामंत्री प्रदीप वर्मा ने चुनाव के दौरान कई नेताओं को नोटिस जारी किया था। इनमें गिरिडीह के कामेश्वर पासवान, धनबाद के संजीव सिंह, लोहरदगा के लक्ष्मीनारायण भगत, धनबाद के भृगुनाथ भगत, गुमला के हीरा साह, मुकेश पंडित, फुलसुंदरी देवी, गढ़वा के अलख नाथ पांडेय, चाईबासा के अनूप सुल्तानिया, मेदिनीनगर के परशुराम ओझा और राकेश सिंह, पाकुड़ की सबरी माला, जामताड़ा के तरुण गुप्ता, जमशेदपुर के राजकुमार श्रीवास्तव, मिहिजाम की नीना शर्मा, चास की परिंदा सिंह और ऋतु रानी सिंह, चिरकुंडा की सुनीता साव तथा धनबाद के अनिल यादव समेत अन्य नाम शामिल थे।

नोटिस में आरोप लगाया गया था कि ये नेता पार्टी विरोधी गतिविधियों में संलिप्त हैं। सात दिनों के भीतर जवाब देने को कहा गया था, अन्यथा अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी दी गई थी। इन नेताओं पर या तो आधिकारिक प्रत्याशी के खिलाफ चुनाव लड़ने या अपने परिजनों को मैदान में उतारने का आरोप था।

मेयर पद पर बागियों की जीत

नगर निगम के मेयर पद के चुनाव ने पार्टी रणनीति पर सवाल खड़े कर दिए। हजारीबाग में अरविंद राणा और धनबाद में संजीव सिंह ने बीजेपी समर्थित उम्मीदवारों को बड़े अंतर से पराजित किया। इन दोनों जगहों पर अधिकृत प्रत्याशी मुकाबले में प्रभावी नहीं दिखे।

देवघर में भी समीकरण बदले। यहां रीता चौरसिया की हार में पार्टी के बागी कार्यकर्ता बाबा बलियासे की भूमिका अहम मानी जा रही है। पार्टी के कुछ नेताओं का मानना है कि यदि बलियासे को समर्थन दिया गया होता तो परिणाम अलग हो सकते थे। पाकुड़ में भी पहले सबरी पाल के नाम पर सहमति बनी थी, लेकिन बाद में रणनीति बदली गई। अंततः जीत सबरी पाल की ही हुई। जामताड़ा में तरुण गुप्ता ने अपनी पत्नी को जीत दिलाने में सफलता हासिल की।

संगठन के सामने चुनौती

पार्टी के भीतर यह स्वीकार किया जा रहा है कि कुछ स्थानों पर उम्मीदवार चयन और समर्थन के फैसले में चूक हुई। स्थानीय कार्यकर्ताओं की राय को पर्याप्त महत्व न देना भारी पड़ा। कुछ नेताओं का मत है कि पार्टी को मेयर पदों पर ही फोकस करना चाहिए था और नगर परिषद व नगर पंचायत अध्यक्ष पद के चुनाव में सीधा हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए था।

फिलहाल बीजेपी की प्राथमिकता संगठन को एकजुट रखना है। बगावत की कड़वाहट को पीछे छोड़कर आगे की रणनीति तय करने की तैयारी चल रही है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि पार्टी अनुशासन और व्यावहारिक राजनीति के बीच किस तरह संतुलन साधती है।