रांची विश्वविद्यालय की परीक्षा प्रणाली एक बार फिर विवादों में है। इस बार मामला बी.एड. की डिग्री में हुई ऐसी त्रुटि का है, जिसने दस्तावेजों की गुणवत्ता और सत्यापन प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक छात्र की डिग्री में हिंदी और अंग्रेजी में उसका नाम अलग-अलग दर्ज कर दिया गया। हिंदी में जहां नाम "गुलाब एक्का" छपा, वहीं अंग्रेजी संस्करण में उसका शाब्दिक अनुवाद करते हुए "Rose Ekka" लिख दिया गया। इस घटना के सामने आने के बाद विश्वविद्यालय की ओर से परीक्षा संबंधी कार्य संभाल रही निजी एजेंसी की कार्यशैली पर फिर बहस शुरू हो गई है।
वर्तमान में विश्वविद्यालय की परीक्षा प्रक्रिया से जुड़े कई महत्वपूर्ण कार्य नेशनल कोऑपरेटिव कंज्यूमर्स फेडरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (एनसीसीएफ) के जिम्मे हैं। अंकपत्र, प्रवेश पत्र, परीक्षा परिणाम और डिग्री जैसे दस्तावेज तैयार करने का दायित्व इसी एजेंसी के पास है। हालांकि विद्यार्थियों और छात्र संगठनों का कहना है कि इस तरह की गलतियां कोई नई बात नहीं हैं और पिछले कुछ वर्षों में ऐसी कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं।
इसी वर्ष फरवरी में भी परीक्षा से ठीक पहले बड़ी संख्या में विद्यार्थियों के एडमिट कार्ड में नाम संबंधी त्रुटियां सामने आई थीं। सिल्ली कॉलेज के 81 छात्रों के प्रवेश पत्रों में नाम गलत दर्ज किए गए थे। वहीं रांची वीमेंस कॉलेज के स्नातक सत्र 2022-26 की गणित और टीआरएल विषय की 40 से अधिक छात्राओं को भी इसी तरह की समस्या का सामना करना पड़ा था। परीक्षा के दौरान इन त्रुटियों को ठीक कराने के लिए छात्रों को अतिरिक्त परेशानियां झेलनी पड़ी थीं।
विद्यार्थियों का आरोप है कि दिक्कत केवल नाम की गलतियों तक सीमित नहीं है। कई मामलों में परीक्षा परिणाम में छात्रों को असफल दिखा दिया जाता है, जबकि कुछ मामलों में किसी विषय में शून्य अंक दर्ज कर दिए जाते हैं। ऐसे मामलों के समाधान के लिए छात्रों को बार-बार विश्वविद्यालय कार्यालय जाना पड़ता है और दस्तावेजों में सुधार की प्रक्रिया कई सप्ताह, कभी-कभी महीनों तक चलती रहती है।
लगातार सामने आ रही इन गड़बड़ियों के बाद विभिन्न छात्र संगठनों ने एनसीसीएफ के खिलाफ कार्रवाई की मांग तेज कर दी है। अबुआ अधिकार मंच के यूथ एवं स्टूडेंट वेलफेयर इंचार्ज अभिषेक शुक्ला का कहना है कि एजेंसी की लापरवाही का सीधा असर विद्यार्थियों की पढ़ाई और उनके भविष्य पर पड़ रहा है। उनका कहना है कि मामूली तकनीकी त्रुटियों को ठीक कराने के लिए भी छात्रों को समय और मानसिक तनाव दोनों का सामना करना पड़ता है।
रांची विश्वविद्यालय ने दिसंबर 2022 में परीक्षा विभाग से जुड़े कई कार्य निजी एजेंसी को सौंपे थे। इससे पहले पूरी व्यवस्था विश्वविद्यालय के परीक्षा विभाग के नियंत्रण में संचालित होती थी। विश्वविद्यालय से जुड़े जानकारों के अनुसार, उस समय परीक्षा संचालन पर वार्षिक खर्च दो करोड़ रुपये से कम था, जबकि विभाग की आय करीब चार करोड़ रुपये होती थी। निजी एजेंसी के आने के बाद परीक्षा शुल्क में वृद्धि हुई और अब विश्वविद्यालय को एजेंसी को हर वर्ष लगभग 15 करोड़ रुपये का भुगतान करना पड़ रहा है।
इस व्यवस्था को लेकर डेटा सुरक्षा को लेकर भी चिंताएं जताई जा रही हैं। पहले छात्रों का शैक्षणिक रिकॉर्ड विश्वविद्यालय के नियंत्रण में रहता था, लेकिन अब बड़ी मात्रा में यह जानकारी निजी एजेंसी के पास उपलब्ध है। शिक्षा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि विद्यार्थियों के अकादमिक रिकॉर्ड की सुरक्षा विश्वविद्यालय की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए और इस विषय पर स्पष्ट जवाबदेही तय की जानी चाहिए।
विश्वविद्यालय परिसर स्थित मोरहाबादी का एग्जामिनेशन डेटा प्रोसेसिंग सेल कभी परीक्षा संचालन का प्रमुख केंद्र माना जाता था। यहीं परीक्षा परिणाम तैयार किए जाते थे और मार्कशीट, माइग्रेशन, प्रोविजनल प्रमाणपत्र तथा डिग्रियां जारी की जाती थीं। विश्वविद्यालय से जुड़े लोगों का दावा है कि उस समय परिणाम अपेक्षाकृत समय पर जारी होते थे और त्रुटियां भी कम होती थीं। निजी एजेंसी को जिम्मेदारी मिलने के बाद यह व्यवस्था लगभग निष्क्रिय हो चुकी है, जबकि वर्तमान में एनसीसीएफ विश्वविद्यालय के सीनेट हॉल से परीक्षा संबंधी कार्यों का संचालन कर रही है।
बी.एड. डिग्री में "गुलाब एक्का" की जगह अंग्रेजी में "Rose Ekka" दर्ज होने की घटना ने केवल एक छात्र की परेशानी को उजागर नहीं किया है, बल्कि परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। छात्रों का कहना है कि यदि डिग्री जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेज में मूल पहचान संबंधी जानकारी भी सही नहीं हो पा रही है, तो पूरी व्यवस्था की गुणवत्ता की गंभीर समीक्षा आवश्यक है। अब सभी की नजर विश्वविद्यालय प्रशासन पर है कि वह इस मामले में क्या कदम उठाता है और भविष्य में ऐसी त्रुटियों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए किस तरह की व्यवस्था लागू करता है।