अप्रैल महीने में वेतन भुगतान में हो रही देरी को लेकर झारखंड में राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। प्रदेश कांग्रेस कमिटी के महासचिव आलोक कुमार दूबे ने भाजपा प्रवक्ता प्रतुल शाहदेव के आरोपों पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए इसे अनावश्यक राजनीतिक मुद्दा करार दिया है। उनका कहना है कि नए वित्तीय वर्ष की शुरुआत के साथ वेतन वितरण में देरी कोई असामान्य बात नहीं, बल्कि लंबे समय से चली आ रही प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा है।
दूबे ने स्पष्ट किया कि हर साल अप्रैल में वेतन आने में देर होने के पीछे कई तकनीकी और प्रक्रियागत कारण होते हैं। इनमें बजट के पारित होने में लगने वाला समय, कोषागार से राशि जारी होने में विलंब और विभागीय स्तर पर बिलों की स्वीकृति में देरी प्रमुख हैं। उन्होंने कहा कि इन प्रक्रियाओं के कारण भुगतान में कुछ दिन की देरी होना स्वाभाविक है।
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि यह स्थिति केवल झारखंड तक सीमित नहीं है। देश के कई राज्यों जैसे बिहार, पश्चिम बंगाल, पंजाब, राजस्थान, ओडिशा, केरल और आंध्र प्रदेश में भी अप्रैल के दौरान कर्मचारियों को वेतन आमतौर पर 10 से 15 तारीख के बीच ही मिलता है। उनके अनुसार, यह वर्षों से चली आ रही एक समान प्रशासनिक व्यवस्था है, जिसे किसी एक सरकार की नाकामी के रूप में पेश करना गलत है।
भाजपा पर निशाना साधते हुए दूबे ने कहा कि पार्टी को वर्तमान स्थिति पर सवाल उठाने से पहले अपने शासनकाल की परिस्थितियों को भी याद करना चाहिए। उनका दावा है कि जब राज्य में भाजपा की सरकार थी, तब भी अप्रैल में वेतन भुगतान में देरी आम बात थी। ऐसे में अब इस मुद्दे को लेकर आरोप-प्रत्यारोप करना केवल राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश है।
कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि इस तरह के बयान देकर जनता के बीच भ्रम पैदा किया जा रहा है और राज्य की छवि को नुकसान पहुंचाने का प्रयास हो रहा है। उन्होंने दोहराया कि वेतन में देरी एक व्यापक प्रशासनिक चुनौती है, जिसे राजनीतिक रंग देना उचित नहीं है।