जीतराम मुंडा ह*त्याकांड में कोर्ट से बड़ा फैसला, साढ़े तीन साल बाद सभी आरोपी बरी

जीतराम मुंडा ह*त्याकांड में कोर्ट से बड़ा फैसला, साढ़े तीन साल बाद सभी आरोपी बरी

By : स्वराज पोस्ट | Edited By: Urvashi
Updated at : Jan 16, 2026, 1:57:00 PM

रांची के ओरमांझी से जुड़ा बहुचर्चित राजनीतिक हत्याकांड आखिरकार अदालत के फैसले के साथ निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। भाजपा नेता जीतराम मुंडा की हत्या के मामले में करीब साढ़े तीन साल बाद कोर्ट ने सभी सात आरोपियों को सबूतों के अभाव में दोषमुक्त कर दिया। इस फैसले ने न केवल कानूनी हलकों, बल्कि झारखंड की सियासत में भी नई बहस छेड़ दी है।

अपर न्यायायुक्त आनंद प्रकाश की अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा। कोर्ट के मुताबिक, प्रस्तुत साक्ष्य और गवाहों के बयान इतने कमजोर थे कि उनके आधार पर दोष सिद्ध नहीं किया जा सकता।

इस मामले में जिन सात लोगों को राहत मिली है, उनमें मनोज मुंडा, डब्ल्यू यादव, कार्तिक मुंडा, रतन बेदिया, बलराम साहू, अमन सिंह और राजीव सिंह शामिल हैं। आरोपियों की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता सुजय दयाल ने बताया कि अभियोजन ने कुल नौ गवाह अदालत में पेश किए, लेकिन कोई भी गवाह ऐसा ठोस और भरोसेमंद प्रमाण नहीं दे सका, जिससे आरोपियों की संलिप्तता साबित हो सके।

दिनदहाड़े हुई थी सनसनीखेज वारदात

पूरा मामला 22 मार्च 2021 का है। ओरमांझी थाना क्षेत्र स्थित आर्यन ढाबा में चाय पी रहे भाजपा नेता जीतराम मुंडा पर अज्ञात हमलावरों ने ताबड़तोड़ गोलियां चला दी थीं, जिससे मौके पर ही उनकी मौत हो गई थी। यह घटना इतनी चौंकाने वाली थी कि पूरे राज्य में राजनीतिक उबाल आ गया। सड़क से लेकर सदन तक इस हत्याकांड को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आईं।

बढ़ते दबाव के बीच पुलिस ने विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया। जांच के दौरान मनोज मुंडा को मुख्य आरोपी बताया गया और उस पर एक लाख रुपये का इनाम भी घोषित किया गया। हालांकि, लंबी जांच प्रक्रिया, गिरफ्तारियों और वर्षों तक चली अदालती सुनवाई के बावजूद अभियोजन पक्ष अदालत के सामने ऐसा कोई पुख्ता मामला खड़ा नहीं कर सका, जो आरोपियों के खिलाफ टिक सके।

परिजनों में निराशा

कोर्ट के इस फैसले के बाद जहां आरोपियों ने राहत की सांस ली है, वहीं जीतराम मुंडा के परिवार और समर्थकों में गहरी निराशा देखी जा रही है। उनका कहना है कि दिनदहाड़े हुई इस हत्या के बावजूद न्याय का रास्ता अधूरा रह गया।

इस फैसले के साथ एक बार फिर यह सवाल खड़ा हो गया है कि चर्चित मामलों में जांच और अभियोजन की कमजोरियां कैसे न्याय की प्रक्रिया को प्रभावित कर देती हैं।