जेटेट में भोजपुरी और मगही की एंट्री पर मंथन तेज, सरकार के सामने क्षेत्रीय पहचान और रोजगार के बीच संतुलन की चुनौती

जेटेट में भोजपुरी और मगही की एंट्री पर मंथन तेज, सरकार के सामने क्षेत्रीय पहचान और रोजगार के बीच संतुलन की चुनौती

By : स्वराज पोस्ट | Edited By: Urvashi
Updated at : May 18, 2026, 1:06:00 PM

झारखंड में शिक्षक नियुक्तियों से जुड़ा भाषा विवाद एक बार फिर राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में केंद्र में आ गया है। राज्य सरकार ने झारखंड शिक्षक पात्रता परीक्षा (JTET) में भोजपुरी, मगही और अंगिका को शामिल करने की मांग पर विचार शुरू कर दिया है। इसी सिलसिले में गठित पांच सदस्यीय मंत्रिस्तरीय समिति की पहली बैठक सोमवार को प्रोजेक्ट भवन में आयोजित हुई, जिसमें शिक्षा और कार्मिक विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी हिस्सा लिया।

सरकारी स्तर पर इसे महज एक नियमित समीक्षा बैठक नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे आने वाले समय में राज्य की सामाजिक संवेदनशीलता और राजनीतिक समीकरणों से जुड़ा अहम कदम समझा जा रहा है। लंबे समय से सीमावर्ती इलाकों के युवाओं द्वारा उठाई जा रही मांग अब सरकार के एजेंडे में औपचारिक रूप से शामिल हो चुकी है।

दरअसल, झारखंड के बिहार सीमा से लगे कई जिलों में भोजपुरी, मगही और अंगिका बोलने वाली आबादी बड़ी संख्या में निवास करती है। इन समुदायों का कहना है कि जेटेट में उनकी भाषाओं को मान्यता नहीं मिलने से स्थानीय अभ्यर्थियों को शिक्षक नियुक्तियों में नुकसान उठाना पड़ता है। इसे लेकर विभिन्न स्तरों पर लगातार आवाज उठाई जाती रही है।

मामले की राजनीतिक संवेदनशीलता को देखते हुए सरकार ने समिति के गठन में क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और राजनीतिक संतुलन दोनों का ध्यान रखा है। समिति में मंत्री दीपिका पांडेय सिंह, राधाकृष्ण किशोर, संजय यादव, योगेंद्र प्रसाद और सुदिव्य कुमार सोनू को शामिल किया गया है। माना जा रहा है कि यह टीम विभिन्न पक्षों से राय लेकर सरकार को आगे की दिशा सुझाएगी।

हालांकि, यह मुद्दा केवल प्रशासनिक फैसले तक सीमित नहीं है। झारखंड में भाषा और स्थानीय पहचान का प्रश्न लंबे समय से भावनात्मक और राजनीतिक बहस का विषय रहा है। राज्य के कई संगठन क्षेत्रीय और आदिवासी भाषाओं को प्राथमिकता देने की मांग करते रहे हैं। वहीं दूसरी ओर सीमावर्ती क्षेत्रों के युवाओं का तर्क है कि उनकी मातृभाषाओं को नजरअंदाज करना अवसरों में असमानता पैदा करता है।

ऐसे में सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती सभी पक्षों के हितों के बीच संतुलन कायम करने की है। आने वाले दिनों में समिति की रिपोर्ट और उस पर सरकार का रुख राज्य की राजनीति और शिक्षा व्यवस्था दोनों पर असर डाल सकता है।