वैश्विक मंच पर झारखंड पर्यटन की दस्तक, वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में पेश होगा राज्य का नया विज़न

वैश्विक मंच पर झारखंड पर्यटन की दस्तक, वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में पेश होगा राज्य का नया विज़न

By : स्वराज पोस्ट | Edited By: Urvashi
Updated at : Jan 17, 2026, 9:07:00 PM

चाहे कोई प्रकृति की शांति खोज रहा हो, आध्यात्मिक अर्थ तलाशता यात्री हो, इतिहास में रुचि रखने वाला अध्येता, रोमांच का शौकीन युवा या फिर सामूहिक सांस्कृतिक अनुभवों की चाह रखने वाला पर्यटक—झारखण्ड अब हर तरह की यात्रा के लिए स्वयं को एक समग्र गंतव्य के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। हेमन्त सोरेन के नेतृत्व में राज्य वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के मंच से दुनिया को ऐसी यात्रा का न्योता देगा, जो केवल देखने तक सीमित नहीं बल्कि अनुभव करने, जुड़ने और ठहरने की भावना से भरी होगी। यह आमंत्रण औपचारिक नहीं, बल्कि आत्मीय और दीर्घकालिक संबंधों पर आधारित है।

राज्य गठन के 25 वर्ष पूरे कर चुका झारखण्ड आज स्वयं को एक युवा, आत्मविश्वासी और संभावनाओं से भरे पर्यटन गंतव्य के रूप में स्थापित कर रहा है। निवेश के माध्यम से पर्यटन अवसंरचना को मजबूत करते हुए, झारखण्ड देशी-विदेशी पर्यटकों के लिए पसंदीदा डेस्टिनेशन बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।

अनुभव आधारित पर्यटन का नया चेहरा

झारखण्ड की खासियत यह है कि यहां की यात्रा भव्य दिखावे पर नहीं, बल्कि जमीन, लोगों और परंपराओं के साथ गहरे जुड़ाव पर आधारित है। घने जंगल, खुले पठार, पारंपरिक गांव, कल-कल बहती नदियां और चट्टानों से गिरते जलप्रपात—यह सब मिलकर एक ऐसा सतत अनुभव रचते हैं, जिसमें प्रकृति और मानव जीवन के बीच निरंतरता दिखती है।

छोटानागपुर पठार की विशिष्ट भौगोलिक संरचना राज्य के पर्यटन स्वरूप को आकार देती है। हुंडरू, दशम, जोन्हा और लोध जैसे जलप्रपात पूर्वी भारत के सबसे आकर्षक प्राकृतिक स्थलों में गिने जाते हैं। यही कारण है कि रांची को ‘झरनों का शहर’, पहाड़ियों से घिरे नेतरहाट को ‘पहाड़ों की रानी’ और हरियाली में बसे मैक्लुस्कीगंज को ‘एंग्लो-इंडियन गांव’ के नाम से पहचाना जाता है।

संस्कृति, आस्था और इतिहास का सहजीवन

झारखण्ड का पर्यटन केवल प्राकृतिक सौंदर्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आदिवासी विरासत से गहराई से जुड़ा हुआ है। यहां की जनजातीय भाषाएं, पर्व-त्योहार, लोककला और जीवन पद्धति आज भी जीवंत परंपराओं के रूप में मौजूद हैं। सरहुल, करम, सोहराय, टुसू जैसे उत्सव प्रकृति और समुदाय के रिश्ते को दर्शाते हैं, जबकि सोहराय-कोहबर चित्रकला, पैतकर पेंटिंग, डोकरा शिल्प और छऊ नृत्य भूमि, आस्था और सृजनशीलता के अद्भुत मेल को सामने लाते हैं।

आध्यात्मिक और ऐतिहासिक स्थल भी राज्य के पर्यटन मानचित्र को व्यापक बनाते हैं। देवघर का बैद्यनाथ धाम, बासुकीनाथ, रजरप्पा, पहाड़ी मंदिर जैसे तीर्थस्थल पलामू और नवरत्नगढ़ के किलों, मलूटी के मंदिर समूह और प्राचीन मेगालिथिक धरोहरों के साथ सहअस्तित्व में हैं, जहां इतिहास और प्रकृति एक-दूसरे में सहज रूप से घुलते नजर आते हैं।

रोमांच, वन्यजीवन और टिकाऊ अवसर

साहसिक पर्यटन झारखण्ड की नई पहचान बनकर उभर रहा है। विविध भू-आकृतिक परिस्थितियां ट्रेकिंग, रॉक क्लाइम्बिंग, वॉटरफॉल रैपलिंग, पैराग्लाइडिंग, जंगल ट्रैक और नदी आधारित गतिविधियों के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान करती हैं। स्थानीय संस्थानों, प्रशिक्षित गाइडों और सामुदायिक भागीदारी के जरिए इन गतिविधियों को सुरक्षित और रोजगारोन्मुखी बनाया जा रहा है।

वन्यजीवन प्रेमियों के लिए पलामू टाइगर रिजर्व, दलमा हाथी अभयारण्य, उधवा बर्ड सैंक्चुरी, हजारीबाग और कोडरमा जैसे अभयारण्य राज्य को एक अलग पहचान देते हैं। इन सभी पहलुओं का समग्र प्रभाव झारखण्ड को भारत के उभरते पर्यटन गंतव्यों की अग्रिम पंक्ति में खड़ा करता है।