झारखंड में 20 हजार करोड़ की परियोजनाएं अटकी, फॉरेस्ट क्लीयरेंस के इंतजार में विकास कार्य ठप

झारखंड में 20 हजार करोड़ की परियोजनाएं अटकी, फॉरेस्ट क्लीयरेंस के इंतजार में विकास कार्य ठप

By : स्वराज पोस्ट | Edited By: Urvashi
Updated at : Mar 31, 2026, 1:08:00 PM

झारखंड में विकास से जुड़ी सैकड़ों परियोजनाएं फिलहाल वन विभाग की अनुमति के अभाव में ठप पड़ी हैं। राज्य में 230 से अधिक ऐसे प्रोजेक्ट हैं, जिनके लिए फॉरेस्ट क्लीयरेंस अनिवार्य है, लेकिन तकनीकी, कानूनी और पर्यावरणीय अड़चनों के कारण इन पर काम आगे नहीं बढ़ पा रहा है। इन परियोजनाओं की कुल अनुमानित लागत 20,000 करोड़ रुपये से ज्यादा बताई जा रही है।

इनमें सबसे बड़ा हिस्सा खनन क्षेत्र का है, जहां कोयला और लौह अयस्क से जुड़े प्रोजेक्ट्स करीब 12,000 करोड़ रुपये के हैं। यदि ये योजनाएं समय पर मंजूरी पा जाती हैं, तो राज्य को हर साल 3,000 करोड़ रुपये से अधिक का अतिरिक्त राजस्व मिलने की संभावना है। यही कारण है कि सरकार अब प्रक्रिया को तेज करने के लिए नई रणनीति पर काम कर रही है।

इसी दिशा में झारखंड सरकार ने ‘वन नीति 2026’ लागू करने की बात कही है, जिसका उद्देश्य मंजूरी की प्रक्रिया को सरल बनाना और लंबित मामलों का त्वरित समाधान करना है। इसके तहत एक ‘क्विक रिस्पॉन्स टीम’ भी गठित की गई है, जो परियोजनाओं से जुड़ी अड़चनों को तेजी से दूर करने का दावा कर रही है।

राज्य में कई बड़े प्रोजेक्ट्स इस समय मंजूरी के इंतजार में हैं। ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड का चित्रा ईस्ट ओपन कास्ट प्रोजेक्ट, जिसमें 3,500 करोड़ रुपये का निवेश प्रस्तावित है, वन भूमि डायवर्जन के अभाव में अटका हुआ है। इसी तरह मगध और आम्रपाली खदानों के विस्तार में घने जंगल और हाथियों के पारंपरिक मार्ग बड़ी बाधा बने हुए हैं।

इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर भी इससे अछूता नहीं है। कोलेबिरा-कामडारा ट्रांसमिशन लाइन, एनएच-320 जी के उन्नयन और हंसडीहा-जसीडीह लाइन जैसे कई महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट वन क्षेत्र में आने के कारण आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। वहीं पश्चिमी सिंहभूम और लातेहार जैसे जिलों में सड़क चौड़ीकरण कार्य भी अभयारण्य और संरक्षित क्षेत्रों की निकटता के कारण प्रभावित हो रहा है।

खनन के अलावा ऊर्जा क्षेत्र पर भी इसका असर साफ दिख रहा है। नई सब-स्टेशन और ट्रांसमिशन लाइनों की स्थापना में देरी से बिजली आपूर्ति के विस्तार की योजनाएं प्रभावित हो रही हैं।

इन देरी के पीछे कई जटिल कारण हैं। नियमों के अनुसार, जितनी वन भूमि का उपयोग किया जाता है, उसके बदले उतनी ही गैर-वन भूमि पर वनीकरण करना अनिवार्य होता है, लेकिन राज्य में उपयुक्त भूमि की उपलब्धता सीमित है। इसके अलावा, पेसा कानून के तहत आदिवासी इलाकों में ग्राम सभा की सहमति जरूरी होती है, जिसे प्राप्त करने में लंबा समय लग जाता है।

वन्यजीव संरक्षण से जुड़े नियम भी एक बड़ी चुनौती हैं। हाथियों के कॉरिडोर और बाघों के आवास क्षेत्रों में किसी भी तरह की ढील नहीं दी जाती, जिससे कई परियोजनाएं पर्यावरणीय स्वीकृति के स्तर पर ही अटक जाती हैं।

ऐसे में सरकार के सामने चुनौती यह है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाते हुए इन महत्वपूर्ण परियोजनाओं को आगे कैसे बढ़ाया जाए। नई वन नीति और त्वरित कार्रवाई तंत्र से उम्मीदें जरूर बढ़ी हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर इनका असर कितना दिखेगा, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा।