झारखंड हाईकोर्ट की सख्ती के बाद माइंस और क्रशर कारोबार पर संकट, पुराने नियम लागू होने से बढ़ी चिंता

झारखंड हाईकोर्ट की सख्ती के बाद माइंस और क्रशर कारोबार पर संकट, पुराने नियम लागू होने से बढ़ी चिंता

By : स्वराज पोस्ट | Edited By: Urvashi
Updated at : May 08, 2026, 12:02:00 PM

झारखंड में खनन और स्टोन क्रशर उद्योग एक बड़े कानूनी और प्रशासनिक संकट का सामना कर रहा है। हाईकोर्ट की हालिया टिप्पणी और आदेश के बाद राज्य की बड़ी संख्या में खनन इकाइयों के संचालन पर अनिश्चितता गहरा गई है। उद्योग जगत का अनुमान है कि मौजूदा स्थिति बनी रही तो करीब 70 प्रतिशत माइंस और क्रशर यूनिट्स प्रभावित हो सकती हैं।

यह मामला एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आया, जहां अदालत ने 2015 में गठित एनओसी विशेषज्ञ समिति की वैधता पर सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि समिति में संबंधित विषयों के विशेषज्ञ शामिल नहीं थे, इसलिए उसे वास्तविक विशेषज्ञ निकाय नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर अदालत ने 2015 में जारी उस गजट अधिसूचना को भी मान्यता देने से इनकार कर दिया, जिसके जरिए खनन गतिविधियों से संबंधित दूरी मानकों में बदलाव किया गया था।

अदालत के निर्देश के बाद अब पुराने नियम प्रभावी माने जाएंगे। इन प्रावधानों के अनुसार वनभूमि के पास खनन गतिविधियों के लिए न्यूनतम 400 मीटर की दूरी अनिवार्य होगी, जबकि क्रशर यूनिट्स को जंगल क्षेत्र से कम-से-कम 500 मीटर दूर स्थापित करना होगा।

फैसले के बाद उद्योग और व्यापार संगठनों में चिंता का माहौल है। चेंबर अध्यक्ष आदित्य मल्होत्रा ने कहा कि इस विषय पर राज्य सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की जाएगी। उन्होंने संकेत दिया कि उद्योग प्रतिनिधिमंडल जल्द मुख्यमंत्री से मुलाकात कर समाधान तलाशने की कोशिश करेगा। उनके मुताबिक यह केवल व्यापारिक मुद्दा नहीं, बल्कि हजारों परिवारों की आजीविका से जुड़ा मामला है।

दरअसल, राज्य सरकार ने वर्ष 2015 में नियमों में संशोधन करते हुए खनन गतिविधियों के लिए निर्धारित दूरी को कम कर दिया था। संशोधित व्यवस्था के तहत आरक्षित और संरक्षित वन क्षेत्र, आबादी वाले इलाकों, जलस्रोतों तथा शैक्षणिक संस्थानों से लगभग 200 से 250 मीटर की दूरी पर भी खनन की अनुमति दी गई थी। इससे पहले इन क्षेत्रों के लिए दूरी सीमा 400 से 500 मीटर तक निर्धारित थी।

खनन कारोबार से जुड़े लोगों का कहना है कि यदि पुराने मानक पूरी तरह लागू किए गए तो राज्य की अधिकांश इकाइयों को संचालन बंद करना पड़ सकता है। इसके चलते बड़ी संख्या में श्रमिकों के रोजगार पर असर पड़ने की आशंका है। साथ ही सरकार के राजस्व संग्रह पर भी व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।