स्वास्थ्य विभाग में टेंडर आवंटन पर सवाल, छह कंपनियों को प्राथमिकता देने के आरोप

स्वास्थ्य विभाग में टेंडर आवंटन पर सवाल, छह कंपनियों को प्राथमिकता देने के आरोप

By : स्वराज पोस्ट | Edited By: Urvashi
Updated at : May 01, 2026, 5:16:00 PM

झारखंड के स्वास्थ्य, परिवार कल्याण एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग से जुड़े अस्पतालों और चिकित्सा संस्थानों में टेंडर आवंटन को लेकर गंभीर अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं। आरोप है कि विभाग के भीतर सीमित संख्या में कुछ कंपनियों को लगातार प्राथमिकता दी जा रही है, जिससे पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धा दोनों प्रभावित हो रहे हैं। इस पूरे प्रकरण में विभागीय मंत्री इरफान अंसारी के संरक्षण की भी चर्चा है, हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी।

मामले की गंभीरता को देखते हुए मुख्य सचिव अविनाश कुमार ने इसे संज्ञान में लेते हुए अपर मुख्य सचिव अजय कुमार सिंह को विस्तृत जांच के निर्देश दिए हैं। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि आउटसोर्सिंग, मानव संसाधन आपूर्ति और दवा खरीद जैसे अधिकांश ठेके कुछ चुनिंदा कंपनियों के बीच ही सीमित हैं। आरोप यह भी है कि निविदा प्रक्रिया की शर्तों में समय-समय पर ऐसे बदलाव किए जाते हैं, जो अन्य संभावित बोलीदाताओं को बाहर कर देते हैं।

7 अप्रैल 2026 को सौंपे गए एक लिखित शिकायत पत्र में दावा किया गया है कि इस पूरे नेटवर्क के केंद्र में तीन भाई हैं, जिनकी कई अलग-अलग कंपनियां पंजीकृत हैं। इन फर्मों के नामों में हिंद इंफ्रा प्रोजेक्ट प्राइवेट लिमिटेड, क्योरिंग फार्मास्युटिकल, भारत आर्ट्स एंड सप्लायर्स, ऑल टाइम मेडिसिन, हृदयालय और मयूरी सॉल्यूशन शामिल हैं। आरोपों के अनुसार, ये सभी संस्थाएं एक ही समूह से जुड़ी हैं और विभागीय प्रभाव के जरिए निविदाओं पर पकड़ बनाए हुए हैं। यहां तक कि यह भी कहा गया है कि टेंडर प्रक्रिया में जेम पोर्टल का उपयोग कर जिलों में दबाव बनाया जाता है।

निविदा शर्तों में कथित हेरफेर का एक उदाहरण कोडरमा से सामने आया है, जहां हाल में जारी एक टेंडर में ऐसे अनुभव मानदंड जोड़े गए, जो सामान्य प्रथाओं से अलग बताए जा रहे हैं। इस टेंडर में बोली लगाने वाली संस्था के लिए पहले कम से कम एक करोड़ रुपये का एकल कार्य अनुभव और दो करोड़ रुपये के कार्य का पूर्व अनुभव अनिवार्य किया गया, जबकि अन्य जिलों में ऐसी शर्तें नहीं पाई गईं। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि इस तरह के प्रावधान छोटे और मध्यम स्तर के आपूर्तिकर्ताओं को प्रतिस्पर्धा से बाहर करने के उद्देश्य से बनाए जाते हैं।

रिम्स सहित कई सरकारी अस्पतालों में आउटसोर्सिंग सेवाओं और सामग्री खरीद में दरों के अंतर को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। कुछ मामलों में एक ही तरह के कार्य या आपूर्ति के लिए अलग-अलग जिलों में अलग-अलग दरें लागू होने की बात कही जा रही है। जिन जिलों में ऐसी अनियमितताओं के आरोप लगे हैं, उनमें कोडरमा, दुमका, जामताड़ा, देवघर, साहेबगंज, गोड्डा, पाकुड़ और रांची शामिल हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि जांच को प्रभावी बनाने के लिए कुछ बुनियादी सवालों के जवाब जरूरी हैं। मसलन, क्या राज्य के सभी सरकारी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों के लिए खरीद प्रक्रिया का कोई समान मानक दस्तावेज है? क्या आउटसोर्सिंग के लिए एकरूप नियम तय हैं? और यदि नहीं, तो अलग-अलग संस्थानों में दरों और शर्तों में इतना अंतर क्यों है? साथ ही, यह भी चिंता जताई जा रही है कि यदि जांच विभाग के भीतर ही कराई जाती है, तो उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठ सकते हैं। ऐसे में स्वतंत्र एजेंसी या बाहरी वरिष्ठ अधिकारी से जांच कराने की मांग भी उठ रही है।