जनजातीय विरासत और आधुनिक विकास के बीच संतुलन जरूरी : राज्यपाल

जनजातीय विरासत और आधुनिक विकास के बीच संतुलन जरूरी : राज्यपाल

By : स्वराज पोस्ट | Edited By: Urvashi
Updated at : Jun 06, 2026, 5:56:00 PM

झारखंड के राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने कहा है कि जनजातीय समाज की सांस्कृतिक पहचान और पारंपरिक मूल्यों को सुरक्षित रखते हुए विकास की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि जनजातीय समुदायों की परंपराएं सामाजिक एकजुटता, प्रकृति के प्रति सम्मान और सामूहिक जिम्मेदारी की भावना को मजबूत करती हैं, जो पूरे देश के लिए प्रेरणास्रोत हैं।

शनिवार को रांची स्थित ऑड्रे हाउस में आयोजित “आदि वार्ता – ए ट्राइबल कॉन्क्लेव” को संबोधित करते हुए राज्यपाल ने जनजातीय समाज से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि झारखंड की पहचान उसकी समृद्ध आदिवासी संस्कृति, सामाजिक जीवन पद्धति और प्राकृतिक संसाधनों के साथ गहरे संबंध से बनती है। इस विरासत का संरक्षण केवल सरकार का ही नहीं, बल्कि पूरे समाज का साझा दायित्व है।

अपने संबोधन में राज्यपाल ने जनजातीय अधिकारों, शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रशासनिक भागीदारी, सांस्कृतिक संरक्षण, पारंपरिक ज्ञान और सतत विकास जैसे विषयों को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि किसी भी समुदाय की प्रगति तभी सार्थक मानी जा सकती है, जब उसकी मूल पहचान और सांस्कृतिक अस्मिता अक्षुण्ण बनी रहे। भारतीय संविधान में अनुसूचित जनजातियों के उत्थान के लिए किए गए विशेष प्रावधानों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना चाहिए और सभी नागरिकों को विकास प्रक्रिया में समान अवसर मिलना चाहिए।

गंगवार ने शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, पोषण, कौशल विकास और आर्थिक आत्मनिर्भरता को जनजातीय क्षेत्रों के विकास का आधार बताया। उन्होंने विशेष रूप से दूर-दराज के इलाकों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता बढ़ाने की जरूरत पर बल दिया। उनके अनुसार इस दिशा में सरकार, शैक्षणिक संस्थानों, सामाजिक संगठनों और स्थानीय समुदायों को मिलकर काम करना होगा।

राज्यपाल ने अपने विभिन्न जिला दौरों का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्हें जनजातीय समाज की प्रतिभा, मेहनत और सामुदायिक भावना को करीब से देखने का अवसर मिला है। उन्होंने आदिवासी महिलाओं की भूमिका की विशेष सराहना करते हुए कहा कि स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से वे न केवल परिवारों को मजबूत कर रही हैं, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था में भी महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं।

विश्व पर्यावरण दिवस के संदर्भ में उन्होंने कहा कि जनजातीय जीवन दर्शन प्रकृति और मानव जीवन के बीच संतुलन का संदेश देता है। सदियों से आदिवासी समुदाय जल, जंगल और जमीन को अपने अस्तित्व का अभिन्न हिस्सा मानते आए हैं। ऐसे समय में जब दुनिया जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है, जनजातीय परंपराएं टिकाऊ विकास का महत्वपूर्ण मार्ग दिखाती हैं।

राज्यपाल ने केंद्र सरकार की विभिन्न पहलों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भगवान बिरसा मुंडा की जयंती को ‘जनजातीय गौरव दिवस’ के रूप में मनाने, एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों के विस्तार और पीएम-जनमन जैसी योजनाओं ने जनजातीय समाज के विकास को नई गति दी है।

युवाओं को संबोधित करते हुए गंगवार ने उन्हें अपनी भाषा, लोककला, लोकसंगीत और पारंपरिक ज्ञान को संरक्षित रखने के साथ-साथ विज्ञान, तकनीक और आधुनिक शिक्षा को अपनाने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि खेल, प्रशासन, विज्ञान, कला और उद्यमिता जैसे क्षेत्रों में आगे बढ़ते हुए युवाओं को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से भी जुड़े रहना चाहिए।

अपने संबोधन के अंत में राज्यपाल ने कहा कि भारत की शक्ति उसकी विविधता में निहित है और जनजातीय समाज देश की सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय चेतना का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उन्होंने विश्वास जताया कि विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने में जनजातीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी और नेतृत्व की अहम भूमिका होगी।