आविर्भाव दिवस विशेष: परमहंस योगानन्द और क्रियायोग का वैश्विक प्रसार

आविर्भाव दिवस विशेष: परमहंस योगानन्द और क्रियायोग का वैश्विक प्रसार

By : स्वराज पोस्ट | Edited By: Urvashi
Updated at : Jan 05, 2026, 11:09:00 AM

आज श्री श्री परमहंस योगानन्दजी के आविर्भाव दिवस पर उनके विचार और जीवन हमें यह स्मरण कराते हैं कि सच्चा गुरु–शिष्य संबंध न तो देह की सीमाओं में बंधा होता है और न ही समय के। गहन ध्यान, अटूट विश्वास और दैवी अनुकम्पा के माध्यम से यह संबंध जीवन और मृत्यु से परे भी निरन्तर प्रवाहित रहता है।

परमहंस योगानन्द का जन्म 5 जनवरी 1893 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में हुआ था। उनके पिता भगवती चरण घोष और माता ज्ञान प्रभा घोष स्वयं आध्यात्मिक प्रवृत्ति के थे, जिससे बाल्यकाल से ही योगानन्दजी के जीवन में भक्ति और साधना के संस्कार विकसित हुए। बचपन में ही वे प्रार्थना और ध्यान में गहरी रुचि लेने लगे थे तथा उन्हें दिव्य प्रकाश और आन्तरिक अनुभूतियों के अनुभव होने लगे थे। आगे चलकर उन्होंने अपनी प्रसिद्ध कृति योगी कथामृत (Autobiography of a Yogi) में इन अनुभवों का उल्लेख किया है, जिन्होंने उनके भीतर ईश्वर-साक्षात्कार की तीव्र आकांक्षा को जन्म दिया।

किशोरावस्था में प्रवेश करते-करते उनकी आध्यात्मिक जिज्ञासा एक दृढ़ संकल्प में बदल गई। उन्हें यह विश्वास था कि हिमालय में महान संत निवास करते हैं जो साधक का मार्गदर्शन कर सकते हैं। इसी विश्वास के कारण उन्होंने कम उम्र में ही कई बार हिमालय जाने का प्रयास किया। यद्यपि ये यात्राएँ भौतिक रूप से सफल नहीं हो सकीं, लेकिन इन्होंने उनके धैर्य, आस्था और साधना को और अधिक मजबूत किया।

वर्ष 1910 में, मात्र सत्रह वर्ष की आयु में, उनका जीवन निर्णायक मोड़ पर पहुँचा जब उनकी भेंट उनके गुरुदेव स्वामी श्रीयुक्तेश्वरजी से हुई। उनके अनुशासनपूर्ण किंतु करुणामय सान्निध्य में मुकुन्द (योगानन्द का पूर्व नाम) ने वर्षों तक कठोर आध्यात्मिक प्रशिक्षण प्राप्त किया। आज्ञाकारिता, ध्यान और पूर्ण समर्पण के माध्यम से उन्हें उनके जीवन-कार्य के लिए तैयार किया गया। बाद में उन्होंने संन्यास दीक्षा ग्रहण कर “परमहंस योगानन्द” नाम धारण किया, जो ईश्वर के साथ एकत्व से प्राप्त परम आनन्द का प्रतीक है।

योगानन्दजी का मानना था कि मनुष्य की हर आकांक्षा, चाहे वह भौतिक लगे, मूलतः ईश्वर की खोज ही है। उनके शब्दों में, मानव जाति निरन्तर किसी “और” की तलाश में रहती है, यह आशा करते हुए कि वहीं पूर्ण सुख मिलेगा; पर जिन्होंने ईश्वर को पा लिया, उनके लिए यह खोज समाप्त हो जाती है, क्योंकि वही ‘और’ स्वयं ईश्वर हैं।

अपनी शिक्षाओं को संस्थागत रूप देने के उद्देश्य से उन्होंने 1917 में राँची में योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ इंडिया (YSS) की स्थापना की। इसके बाद 1920 में वे अमेरिका गए और लॉस एंजेलिस में सेल्फ-रियलाइजेशन फेलोशिप (SRF) की नींव रखी। इन दोनों संगठनों के माध्यम से उन्होंने क्रियायोग, वैज्ञानिक ध्यान और संतुलित आध्यात्मिक जीवन की शिक्षाओं को व्याख्यानों, ध्यान केंद्रों और गृह-अध्ययन पाठ्यक्रमों द्वारा विश्वभर में फैलाया।

लगभग तीन दशकों से अधिक समय तक पश्चिमी देशों में सक्रिय रहते हुए योगानन्दजी ने ईश्वर-भक्ति, नियमित ध्यान और सभी धर्मों की मूल एकता पर जोर दिया। उनका संदेश केवल विश्वास तक सीमित नहीं था; वे साधकों को ईश्वर के प्रत्यक्ष अनुभव के लिए प्रेरित करते थे।

उनकी कालजयी रचना योगी कथामृत आज भी विश्वभर में लाखों पाठकों को प्रेरित कर रही है और असंख्य जिज्ञासु आत्माओं को ईश्वर-साक्षात्कार के पथ पर अग्रसर कर रही है। इसके अतिरिक्त ईश्वर-अर्जुन संवाद: श्रीमद्भगवद्गीता और द सेकंड कमिंग ऑफ क्राइस्ट जैसी कृतियों में उन्होंने पूर्व और पश्चिम की आध्यात्मिक परम्पराओं के साझा और सार्वभौमिक सत्यों को सरलता से उजागर किया।

आविर्भाव दिवस के इस पावन अवसर पर, उनके अनुयायी और साधक आज भी यह अनुभव करते हैं कि सच्चे आह्वान पर उनका दिव्य मार्गदर्शन उपलब्ध है। भक्ति, अनुशासन और ईश्वर की कृपा के सहारे परमहंस योगानन्दजी का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है—कि जीवन की सम्पूर्णता और सच्चा आनन्द केवल ईश्वर-प्राप्ति में ही निहित है।