खनिज संपदा के बावजूद पिछड़ रहा झारखंड, नीलामी और निवेश में अटकी बड़ी परियोजनाएं

खनिज संपदा के बावजूद पिछड़ रहा झारखंड, नीलामी और निवेश में अटकी बड़ी परियोजनाएं

By : स्वराज पोस्ट | Edited By: Urvashi
Updated at : Apr 01, 2026, 1:28:00 PM

प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता के कारण लंबे समय से ‘रत्नागर्भा’ के रूप में पहचाने जाने वाले झारखंड की खनन क्षमता आज कई चुनौतियों से जूझती दिखाई दे रही है। एक ओर जहां केंद्र सरकार ने वित्तीय वर्ष 2025-26 में देशभर में 200 खनिज ब्लॉकों की नीलामी कर रिकॉर्ड बनाया है, वहीं झारखंड में कई महत्वपूर्ण खनिज परियोजनाएं अब भी प्रक्रियागत अड़चनों के कारण आगे नहीं बढ़ पा रही हैं।

राज्य में सोने के भंडार की मौजूदगी को लेकर पहले ही पुष्टि हो चुकी है। रांची जिले के तमाड़ स्थित पहाड़िया क्षेत्र और सरायकेला-खरसावां के कुंदरकोचा में स्वर्ण भंडार चिन्हित किए जा चुके हैं। कुंदरकोचा में सीमित स्तर पर खनन गतिविधियां भी हुई हैं, लेकिन बड़े पैमाने पर व्यावसायिक खनन शुरू नहीं हो सका है। हालांकि कुछ छोटे टेंडर जारी हुए हैं, लेकिन प्रमुख गोल्ड ब्लॉकों की नीलामी अब तक लंबित है, जिससे निवेशकों की रुचि अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच पाई है।

खनन क्षेत्र की प्रगति में सबसे बड़ी अड़चन वन एवं पर्यावरण स्वीकृतियों से जुड़ी प्रक्रियाएं बन रही हैं। कई परियोजनाएं इसी कारण अटकी हुई हैं। हाल के घटनाक्रम में केंद्र सरकार को 11 महत्वपूर्ण खनिज ब्लॉकों की नीलामी रद्द करनी पड़ी, जिनमें झारखंड के हिस्से भी शामिल थे। इसके पीछे पर्याप्त योग्य बोलीदाताओं का अभाव प्रमुख कारण बताया गया।

रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण खनिजों, जैसे लिथियम और कोबाल्ट, के मामले में भी स्थिति कुछ अलग नहीं है। राज्य में इनके संभावित ब्लॉक चिन्हित होने के बावजूद तकनीकी रूप से सक्षम कंपनियों की कमी के चलते नीलामी प्रक्रिया प्रभावित हो रही है। इसी कारण हाल ही में आयोजित नीलामी का एक चरण रद्द करना पड़ा, जिससे संभावित निवेश को झटका लगा है।

इधर, पारंपरिक खनन क्षेत्रों में भी चुनौतियां सामने आ रही हैं। धनबाद और हजारीबाग जैसे इलाकों की कई कोयला खदानें आने वाले वर्षों में आर्थिक रूप से कम लाभकारी हो सकती हैं। इस परिदृश्य को देखते हुए राज्य सरकार अब ऊर्जा के वैकल्पिक और हरित स्रोतों की ओर ध्यान केंद्रित कर रही है, जिसका असर खनन क्षेत्र में निवेश की रफ्तार पर भी पड़ रहा है।

भूमि अधिग्रहण और विस्थापन से जुड़े मुद्दे भी बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए बाधक बने हुए हैं। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि राज्य केवल खनिजों के दोहन तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि वैल्यू एडिशन के जरिए आर्थिक लाभ बढ़ाने की दिशा में काम करेगा। हालांकि, जमीन से जुड़े जटिल कानूनी और सामाजिक पहलू परियोजनाओं के क्रियान्वयन को धीमा कर रहे हैं।

इन तमाम चुनौतियों के बीच झारखंड के लिए यह एक महत्वपूर्ण मोड़ है, जहां उसे अपनी खनन नीतियों और निवेश आकर्षित करने की रणनीतियों पर नए सिरे से काम करने की आवश्यकता है, ताकि उसकी खनिज संपदा का समुचित उपयोग हो सके।