मौसम में आए बदलाव और कमजोर मानसून ने सरायकेला-खरसावां जिले के किसानों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि 'अल नीनो' के प्रभाव के कारण इस बार जिले में सामान्य से करीब 20 से 25 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई है। बारिश की कमी से सूखे जैसे हालात बनने लगे हैं, जिससे खरीफ फसलों, खासकर धान की खेती पर प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) ने किसानों के लिए जागरूकता और प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किए हैं। इन कार्यक्रमों के माध्यम से किसानों को बदलते मौसम के अनुरूप खेती की नई रणनीतियों और कम जोखिम वाले विकल्पों की जानकारी दी जा रही है, ताकि उत्पादन और आय दोनों को सुरक्षित रखा जा सके।
कृषि विज्ञान केंद्र के प्रधान सह वरिष्ठ वैज्ञानिक पंकज सेठ ने किसानों को सलाह दी कि वे अधिक पानी पर निर्भर पारंपरिक धान की किस्मों के बजाय कम अवधि में तैयार होने वाली और कम सिंचाई की आवश्यकता वाली किस्मों का चयन करें। उन्होंने 'सहभागी', 'सीआर-320', 'नवीन' और 'अंजलि' जैसी धान की प्रजातियों को अपनाने की सिफारिश की। साथ ही ऊपरी और मध्यम श्रेणी की भूमि में धान की खेती से बचने की सलाह भी दी।
विशेषज्ञों के अनुसार ऐसी भूमि पर मक्का, मूंग, उड़द, अरहर जैसी दलहनी फसलें तथा तिल और सुरगुजा जैसी तिलहनी फसलें किसानों के लिए अधिक लाभकारी साबित हो सकती हैं। उन्होंने जलवायु संबंधी अनिश्चितताओं को देखते हुए एकीकृत कृषि प्रणाली अपनाने पर जोर दिया, जिससे खेती के साथ अन्य स्रोतों से भी आय सुनिश्चित हो सके।
कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को मुर्गीपालन, बत्तख पालन, भेड़ एवं बकरी पालन जैसे सहायक व्यवसायों को खेती के साथ जोड़ने की सलाह दी। इसके अलावा दीर्घकालिक लाभ और भूमि की उर्वरता बनाए रखने के लिए फलदार पौधों का रोपण तथा जैविक और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की भी अपील की गई।
प्रशिक्षण में शामिल किसानों ने भी इसे उपयोगी बताया। स्थानीय किसान श्रीकांत महतो ने कहा कि कम बारिश की संभावना को देखते हुए इस वर्ष धान की खेती चुनौतीपूर्ण हो सकती है। ऐसे में कृषि विभाग की ओर से दी जा रही तकनीकी जानकारी उनके लिए काफी उपयोगी है। उन्होंने बताया कि वे अपनी टांड़ भूमि में इस बार मूंगफली की खेती करने की तैयारी कर चुके हैं।
गम्हरिया प्रखंड की महिला किसान रैनागी किस्कु ने बताया कि उन्हें कृषि विज्ञान केंद्र से के-1812 किस्म के मूंगफली के बीज और आवश्यक दवाइयां उपलब्ध कराई गई हैं। प्रशिक्षण के दौरान वैज्ञानिकों से बुवाई की आधुनिक तकनीक और बलुई मिट्टी में खेती के तरीकों की जानकारी मिलने के बाद उन्हें इस सीजन में बेहतर उत्पादन की उम्मीद है।