नई दिल्ली के राष्ट्रपति भवन में मंगलवार को आयोजित अलंकरण समारोह में झारखंड आंदोलन के प्रमुख शिल्पकार और झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के संस्थापक दिवंगत दिशोम गुरु शिबू सोरेन को मरणोपरांत देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उनकी पत्नी रूपी सोरेन को यह सम्मान प्रदान किया। इस अवसर पर शिबू सोरेन की पुत्रवधू एवं विधायक कल्पना सोरेन भी मौजूद रहीं और इस ऐतिहासिक क्षण की साक्षी बनीं।
यह सम्मान केवल एक जननेता को श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि उन दशकों लंबे सामाजिक और राजनीतिक संघर्ष की राष्ट्रीय स्वीकृति भी माना जा रहा है, जिसके केंद्र में आदिवासियों के अधिकार, जल-जंगल-जमीन की रक्षा और अलग झारखंड राज्य की मांग रही। केंद्र सरकार ने 25 जनवरी को लोककल्याण के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए पद्मभूषण देने की घोषणा की थी, जिसे अब औपचारिक रूप से प्रदान किया गया।
11 जनवरी 1944 को वर्तमान रामगढ़ जिले के नेमरा गांव में जन्मे शिबू सोरेन का बचपन सामान्य परिस्थितियों में बीत रहा था, लेकिन किशोरावस्था में ही उनके जीवन ने निर्णायक मोड़ लिया। उनके पिता सोबरन सोरेन की हत्या कथित रूप से महाजनों और सूदखोरों के खिलाफ आवाज उठाने के कारण कर दी गई। उस घटना ने युवा शिबू सोरेन के भीतर अन्याय के खिलाफ संघर्ष का संकल्प पैदा किया।
इसके बाद उन्होंने आदिवासियों और गरीब किसानों की जमीनों पर अवैध कब्जे तथा महाजनी शोषण के खिलाफ व्यापक जनआंदोलन शुरू किया। गांव-गांव जाकर लोगों को संगठित करने और उनके अधिकारों के लिए लड़ने के कारण वे तेजी से जननेता के रूप में उभरे। उनके प्रयासों से अनेक लोगों को उनकी जमीनें वापस मिलीं और सामाजिक न्याय की लड़ाई को नई दिशा मिली।
संथाल परगना क्षेत्र में उनके नेतृत्व और जनसंपर्क ने उन्हें असाधारण लोकप्रियता दिलाई। स्थानीय लोगों ने उन्हें सम्मानपूर्वक 'दिशोम गुरु' की उपाधि दी, जिसका अर्थ है 'देश का गुरु'। समय के साथ यह नाम उनकी पहचान बन गया।
1970 के दशक में उन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) की स्थापना की। यह संगठन अलग झारखंड राज्य की मांग के साथ-साथ आदिवासी, पिछड़े और वंचित समुदायों के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक अधिकारों की आवाज बनकर उभरा। उनके नेतृत्व में आंदोलन ने व्यापक जनसमर्थन हासिल किया और राष्ट्रीय राजनीति का महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया।
शिबू सोरेन ने झारखंड राज्य की मांग को केवल क्षेत्रीय आंदोलन तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि उसे राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया। लंबे संघर्ष और जनदबाव के बाद वर्ष 2000 में बिहार से अलग झारखंड राज्य का गठन हुआ। इस ऐतिहासिक उपलब्धि में उनके योगदान को निर्णायक माना जाता है।
राज्य बनने के बाद भी उन्होंने विकास, आदिवासी अधिकारों, किसानों, श्रमिकों और वंचित वर्गों के मुद्दों को अपनी राजनीति के केंद्र में बनाए रखा। चाहे संगठन में उनकी भूमिका रही हो या सरकार में, उन्होंने हमेशा सामाजिक न्याय को प्राथमिकता देने की कोशिश की।
शिबू सोरेन का राजनीतिक जीवन चार दशक से अधिक समय तक सक्रिय रहा। वे 2005, 2008 और 2009-10 के दौरान, तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने। हालांकि गठबंधन राजनीति के कारण उनके कार्यकाल अपेक्षाकृत छोटे रहे, लेकिन उनकी सरकारों की नीतियों में गरीब और ग्रामीण समाज के हितों को प्रमुखता दी गई।
संसदीय राजनीति में भी उनका प्रभाव उल्लेखनीय रहा। वे दुमका लोकसभा क्षेत्र से आठ बार सांसद निर्वाचित हुए। इसके अलावा वे राज्यसभा के सदस्य भी रहे और केंद्र सरकार में तीन अलग-अलग कार्यकाल में कोयला मंत्री का दायित्व संभाला। संसद से लेकर जनसभाओं तक उन्होंने लगातार आदिवासी समाज और वंचित वर्गों की आवाज बुलंद की।
वर्ष 2025 में 81 वर्ष की आयु में शिबू सोरेन का निधन हो गया। उनके जाने के साथ झारखंड ने अपने सबसे प्रभावशाली जननेताओं में से एक को खो दिया, लेकिन उनके विचार, आंदोलन और राजनीतिक विरासत आज भी राज्य की सामाजिक और राजनीतिक चेतना का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
राष्ट्रपति भवन में मिला पद्मभूषण सम्मान इस बात का प्रतीक है कि देश ने उनके लंबे सार्वजनिक जीवन, सामाजिक संघर्ष और जनसेवा को औपचारिक रूप से सम्मानित किया है। जल, जंगल और जमीन के अधिकारों की लड़ाई तथा अलग झारखंड राज्य के आंदोलन में निभाई गई उनकी भूमिका आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी।