559 दिन की देरी पर झारखंड HC सख्त, सरकार की अपील खारिज

559 दिन की देरी पर झारखंड HC सख्त, सरकार की अपील खारिज

By : स्वराज पोस्ट | Edited By: Urvashi
Updated at : Jul 14, 2026, 1:41:00 PM

झारखंड हाईकोर्ट ने सरकारी मुकदमों में देरी और प्रशासनिक उदासीनता पर एक बार फिर कड़ी टिप्पणी करते हुए राज्य सरकार को बड़ा झटका दिया है। अदालत ने देवघर की एक आंगनबाड़ी सेविका की सेवा बहाली के आदेश को चुनौती देने वाली सरकार की अपील स्वीकार करने से इनकार कर दिया। कारण यह रहा कि अपील निर्धारित समय सीमा के बजाय 559 दिन की देरी से दायर की गई थी और सरकार इस विलंब के लिए अदालत को कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दे सकी।

मुख्य न्यायाधीश एम.एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने देरी माफ करने संबंधी राज्य सरकार की याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि फाइलों का विभिन्न विभागों में घूमना, प्रशासनिक मंजूरियां या औपचारिक प्रक्रिया कानूनी समयसीमा का उल्लंघन करने का वैध आधार नहीं हो सकतीं। अदालत ने कहा कि सरकारी विभाग भी समय-सीमा संबंधी कानूनों का पालन करने के लिए समान रूप से बाध्य हैं।

फर्जी प्रमाणपत्र के आरोप में हुई थी बर्खास्तगी

मामला देवघर जिले के चंदनपुरा की आंगनबाड़ी सेविका सकीला बानू से जुड़ा है। वर्ष 2007 में आमसभा के माध्यम से नियुक्त सकीला बानू को करीब एक दशक तक सेवा देने के बाद अक्टूबर 2016 में फर्जी शैक्षणिक प्रमाणपत्र प्रस्तुत करने के आरोप में पद से हटा दिया गया था। इसके खिलाफ उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

9 अगस्त 2023 को हाईकोर्ट की एकल पीठ के न्यायाधीश जस्टिस एस.एन. पाठक ने प्रशासन की कार्रवाई को अवैध ठहराते हुए बर्खास्तगी रद्द कर दी थी। अदालत ने माना था कि प्रशासन ने बिना समुचित जांच के निर्णय लिया और सूचना के अधिकार (आरटीआई) के माध्यम से उपलब्ध उन अभिलेखों की अनदेखी की, जिनसे प्रमाणपत्रों की वैधता की पुष्टि होती थी।

बहाली के आदेश के खिलाफ समय पर अपील नहीं कर सकी सरकार

एकल पीठ ने सरकार को सकीला बानू को सभी लंबित मानदेय और अन्य सेवा लाभों सहित पुनः नियुक्त करने का निर्देश दिया था। हालांकि राज्य सरकार ने इस आदेश को चुनौती देने में 559 दिन का समय लगा दिया। खंडपीठ ने केस रिकॉर्ड की समीक्षा के दौरान पाया कि लंबे समय तक फाइलें विभागों में बिना किसी प्रगति के पड़ी रहीं।

अदालत ने यह भी नोट किया कि जुलाई 2024 में अपील का मसौदा तैयार हो जाने के बावजूद उसे मार्च 2025 तक दाखिल नहीं किया गया। इस लगभग आठ महीने की अवधि के संबंध में भी सरकार कोई ठोस कारण प्रस्तुत नहीं कर सकी।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि केवल विभागीय प्रक्रिया, फाइलों के आदान-प्रदान या कानूनी सलाह लेने का हवाला देकर लंबे समय तक निष्क्रिय रहने को उचित नहीं ठहराया जा सकता। न्यायालय का दायित्व प्रशासनिक शिथिलता को संरक्षण देना नहीं, बल्कि कानून के शासन को सुनिश्चित करना है।

खंडपीठ ने यह भी उल्लेख किया कि हाल के सप्ताहों में राज्य सरकार की दो अन्य अपीलें भी क्रमशः 762 और 475 दिनों की देरी के कारण खारिज की जा चुकी हैं। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का उल्लेख करते हुए अदालत ने दोहराया कि समय-सीमा संबंधी कानूनों के पालन में सरकारी विभागों को कोई विशेष रियायत नहीं दी जा सकती।

इस निर्णय के साथ ही सकीला बानू की सेवा में बहाली तथा उन्हें लंबित मानदेय और अन्य लाभ प्रदान किए जाने का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है।