पलामू जिले के गठन को 134 वर्ष पूरे, 1857 क्रांति से लेकर संविधान निर्माण तक रही अहम भूमिका

पलामू जिले के गठन को 134 वर्ष पूरे, 1857 क्रांति से लेकर संविधान निर्माण तक रही अहम भूमिका

By : स्वराज पोस्ट | Edited By: Urvashi
Updated at : Jan 01, 2026, 5:51:00 PM

झारखंड का पलामू जिला अपने लंबे और घटनापूर्ण इतिहास के लिए जाना जाता है। 1 जनवरी 1892 को अस्तित्व में आया यह जिला आज अपने गठन के 134 वर्ष पूरे कर चुका है। समय के साथ पलामू ने राजनीतिक, सामाजिक और सुरक्षा से जुड़े कई अहम दौर देखे हैं। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष से लेकर नक्सली आंदोलन के प्रभाव तक, यह इलाका हमेशा ऐतिहासिक घटनाओं के केंद्र में रहा है।

पलामू की भौगोलिक सीमाएं बिहार के गया और औरंगाबाद जिलों के साथ-साथ झारखंड के गढ़वा, लातेहार और चतरा से जुड़ी हुई हैं। कभी एक विशाल जिले के रूप में पहचाने जाने वाले पलामू से गढ़वा को 1991 में और लातेहार को 2001 में अलग जिला बनाया गया। वर्तमान में यह जिला देश के आकांक्षी जिलों में शामिल है, जो लंबे समय तक सूखा, अकाल और पलायन जैसी समस्याओं के कारण चर्चा में रहा। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, पलामू की जनसंख्या लगभग 19.36 लाख है। जिले का प्रशासनिक मुख्यालय मेदिनीनगर में स्थित है। उल्लेखनीय है कि पलामू केवल एक जिला ही नहीं, बल्कि एक प्रमंडल भी है, जिसकी स्थापना 2 मई 1892 को हुई थी।

1857 की क्रांति में पलामू का योगदान

भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान पलामू ने अलग पहचान बनाई। जब देश के कई हिस्सों में 1857 का विद्रोह कमजोर पड़ने लगा था, तब भी इस क्षेत्र में अंग्रेजों के खिलाफ प्रतिरोध जारी रहा। नीलांबर और पीतांबर नामक दो भाइयों ने यहां गुरिल्ला युद्ध का नेतृत्व किया और 1859 तक संघर्ष को जीवित रखा। दोनों ने राजहरा रेलवे स्टेशन पर हमला कर ब्रिटिश शासन की कोयला आपूर्ति बाधित कर दी थी।

अंग्रेजी सरकार ने इस आंदोलन को दबाने के लिए कर्नल डाल्टन के नेतृत्व में मद्रास इन्फेंट्री की घुड़सवार और विशेष हथियारबंद टुकड़ियों को पलामू भेजा। लगभग 24 दिनों के अभियान के बाद 1859 में धोखे से दोनों भाइयों को गिरफ्तार कर लिया गया और मार्च 1859 में लेस्लीगंज (पलामू) में उन्हें फांसी दे दी गई।

नक्सली आंदोलन का दौर

बाद के दशकों में पलामू नक्सली गतिविधियों का भी बड़ा केंद्र बना। नक्सलबाड़ी आंदोलन के कमजोर पड़ने के बाद यह इलाका नक्सलियों के लिए नया आधार क्षेत्र बना। वर्ष 1984 में नक्सली हिंसा से जुड़ी पहली हत्या यहीं दर्ज की गई, जबकि 1990 के दशक में इस क्षेत्र ने पहला बड़ा नरसंहार भी देखा। उत्तर और दक्षिण भारत में सक्रिय नक्सली संगठनों के विभाजन की जड़ें भी पलामू क्षेत्र से जुड़ी रही हैं।

1990 के बाद इस इलाके में पहली बार IED और क्लेमोर माइंस का इस्तेमाल नक्सलियों द्वारा किया गया था। हालांकि अब स्थिति में बड़ा बदलाव आया है। अप्रैल 2024 में पलामू को आधिकारिक रूप से नक्सल मुक्त घोषित किया गया। इसके बाद केंद्र सरकार ने जिले को SRE (सुरक्षा संबंधी व्यय) की सूची से बाहर कर दिया। कभी आधा दर्जन से अधिक नक्सली संगठनों की मौजूदगी वाला यह इलाका अब विकास की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

संविधान निर्माण में पलामू की भागीदारी

पलामू का योगदान केवल संघर्ष तक सीमित नहीं रहा, बल्कि देश के संवैधानिक इतिहास में भी इसकी अहम भूमिका रही है। 1946 में गठित संविधान सभा में पलामू से यदुवंश सहाय और अमियो कुमार घोष सदस्य थे। यदुवंश सहाय ने संविधान की पांचवीं अनुसूची के प्रावधानों का समर्थन किया था, जो अनुसूचित क्षेत्रों के संरक्षण से जुड़ी है। हाल ही में झारखंड सरकार द्वारा पेसा नियमावली को मंजूरी दिए जाने के साथ ही यह ऐतिहासिक भूमिका एक बार फिर चर्चा में आई है।