झारखंड सरकार ने दो अलग-अलग प्रशासनिक मामलों में महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए एक ओर पलामू के पाटन प्रखंड के तत्कालीन प्रखंड विकास पदाधिकारी (बीडीओ) मनोज कुमार तिवारी पर विभागीय कार्रवाई की है, जबकि दूसरी ओर संयुक्त सचिव राधेश्याम प्रसाद के खिलाफ लंबे समय से लंबित प्रकरण को समाप्त करने का आदेश जारी किया है।
सरकारी आदेश के अनुसार, मनोज कुमार तिवारी पर मनरेगा के तहत पशु शेड निर्माण योजनाओं के क्रियान्वयन में निर्धारित दिशा-निर्देशों की अनदेखी करने का आरोप सही पाया गया। जांच में सामने आया कि पाटन प्रखंड की 22 पंचायतों में से 19 पंचायतों में विभाग द्वारा तय सीमा से कहीं अधिक संख्या में पशु शेड योजनाओं को स्वीकृति दी गई। जहां प्रत्येक पंचायत में अधिकतम पांच पशु शेड की अनुमति थी, वहीं कुल 401 पशु शेड योजनाओं को मंजूरी देकर लागू किया गया।
सरकार का मानना है कि मनरेगा से संबंधित दायित्वों का निर्वहन करते समय आवश्यक सावधानी नहीं बरती गई और विभागीय नियमों का पालन नहीं किया गया। इस लापरवाही के कारण सरकारी धन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा और वित्तीय नुकसान हुआ। विभागीय जांच के दौरान मनोज कुमार तिवारी ने अपने बचाव में यह तर्क दिया कि एक ही विषय पर बार-बार कार्रवाई कर उन्हें पूर्वाग्रह का शिकार बनाया जा रहा है। हालांकि, सरकार ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया और झारखंड सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2016 के तहत उन पर 'निंदन' (Censure) का दंड लगाया।
उधर, संयुक्त सचिव राधेश्याम प्रसाद को एक पुराने मामले में बड़ी प्रशासनिक राहत मिली है। उन पर फेनहारा थाना कांड संख्या 29/05 के तहत सरकारी राशि के कथित दुरुपयोग और अनियमितताओं के आरोप लगाए गए थे। हालांकि, मोतिहारी की अदालत ने 20 दिसंबर 2023 को साक्ष्यों के अभाव में उन्हें दोषमुक्त कर दिया था।
अदालती फैसले के बाद अभियोजन पक्ष की ओर से कोई अपील दायर नहीं की गई। इसके मद्देनजर झारखंड सरकार ने भी मामले की समीक्षा करते हुए संबंधित फाइल को बंद करने का निर्णय लिया है। सरकार के इस आदेश के साथ ही राधेश्याम प्रसाद से जुड़ा यह लंबे समय से लंबित प्रशासनिक प्रकरण औपचारिक रूप से समाप्त हो गया।