हजारीबाग में चर्चित फर्जी एफआईआर प्रकरण में कार्रवाई तेज होने के बीच कई अधिकारियों ने न्यायालय के समक्ष आत्मसमर्पण किया, जिसके बाद उन्हें जमानत प्रदान कर दी गई। पेयजल एवं स्वच्छता विभाग के अवर सचिव कुमुद झा, मुख्यमंत्री सुरक्षा में तैनात स्पेशल ब्रांच के इंस्पेक्टर रामदयाल मुंडा और अकील अहमद, साथ ही सेवानिवृत्त डीएसपी अखिलेश सिंह ने जमानतीय वारंट जारी होने के बाद अदालत में पेश होकर राहत हासिल की।
यह कदम तब उठाया गया जब हजारीबाग के न्यायिक मजिस्ट्रेट विवेक कुमार की अदालत ने पूर्व में लंबित मामले में झारखंड हाईकोर्ट द्वारा दी गई अंतरिम रोक हटने के बाद वारंट जारी किया। हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति अनिल चौधरी की पीठ ने पहले हजारीबाग कोर्ट की कार्रवाई पर लगी रोक समाप्त कर दी थी। इसके साथ ही अदालत ने एनटीपीसी के पूर्व महाप्रबंधक टी. गोपाल कृष्ण पर दो हजार रुपये और कुमुद झा पर एक हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया था।
मामले की जड़ें वर्ष 2016 में बड़कागांव थाना क्षेत्र के एक प्रकरण से जुड़ी हैं। आरोप है कि चिरुडीह में 17 मई 2016 को हुई घटना के बाद पुलिस ने तत्कालीन कार्यपालक दंडाधिकारी के आवेदन में बदलाव कर कुछ अन्य व्यक्तियों के नाम जोड़ दिए थे, जिससे पूरे मामले की दिशा बदल गई।
इस प्रकरण में न्यायिक दंडाधिकारी प्रथम श्रेणी शिवानी शर्मा की अदालत ने प्रारंभिक साक्ष्यों के आधार पर कई अधिकारियों को आरोपी मानते हुए समन जारी किया था। इनमें कुमुद झा (तत्कालीन बीडीओ), इंस्पेक्टर रामदयाल मुंडा, अकील अहमद, सेवानिवृत्त डीएसपी अखिलेश सिंह और एनटीपीसी के पूर्व जीएम टी. गोपाल कृष्ण शामिल थे। अदालत ने इन सभी को निर्धारित तिथि पर उपस्थित होने का निर्देश दिया था।
मंटू सोनी उर्फ शनि कांत द्वारा दायर परिवाद मामले में वकीलों की दलीलों और गवाहों के बयानों पर विचार करने के बाद कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता की कई धाराओं (166, 166ए, 167, 218 और 220) के तहत प्रथम दृष्टया आरोप बनते हुए संज्ञान लिया था। उस समय सभी संबंधित अधिकारी बड़कागांव क्षेत्र में विभिन्न पदों पर कार्यरत थे।