सहरसा। सावन मास की पहली सोमवारी के साथ ही मिथिलांचल में नवविवाहिताओं का प्रमुख पर्व मधुश्रावणी भी सोमवार से शुरू होगा। इस वर्ष सावन मास में चार सोमवारी पड़ रही हैं। सावन की पहली सोमवारी 3 अगस्त को है। इस अवसर पर जिले के विभिन्न शिवालयों में भगवान भोलेनाथ की पूजा-अर्चना के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ेगी। मंदिरों में हर-हर महादेव के जयघोष से वातावरण भक्तिमय होने की उम्मीद है।
ब्रज किशोर ज्योतिष संस्थान एवं फाउंडेशन के संस्थापक तथा प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पंडित तरुण झा ने बताया कि मिथिलांचल की परंपरा में मधुश्रावणी पर्व नवविवाहिताओं के लिए विशेष महत्व रखता है। श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि से शुरू होने वाला यह पर्व शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को संपन्न होता है। इस वर्ष मधुश्रावणी की शुरुआत 3 अगस्त से होगी और इसका समापन 15 अगस्त को होगा।
फूल चुनकर माता विषहरा और शिव-पार्वती की होती है पूजा
पंडित तरुण झा के अनुसार मधुश्रावणी के दौरान नवविवाहिताएं प्रतिदिन बगीचों से फूल चुनकर लाती हैं और माता विषहरा सहित भगवान शिव एवं माता पार्वती की पूजा करती हैं। फूल चुनने के दौरान महिलाओं द्वारा गाए जाने वाले पारंपरिक गीतों से वातावरण भी सुहावना हो जाता है।
15 दिनों तक चलने वाले इस पर्व में नवविवाहिताओं को दो दिन नाग देवता की कथा सुनाई जाती है। शेष 13 दिनों में सावित्री-सत्यवान, शिव-पार्वती, राम-सीता और राधा-कृष्ण सहित विभिन्न देवी-देवताओं से जुड़ी कथाएं सुनने की परंपरा है।
पति की दीर्घायु के लिए करती हैं पूजा
मधुश्रावणी के दौरान नवविवाहिताएं अपने ससुराल से भेजे गए खाद्य पदार्थों का सेवन करती हैं और वहां से भेजे गए नए वस्त्र धारण करती हैं। कथा वाचिका द्वारा अलग-अलग अध्यायों में धार्मिक कथाओं का श्रवण कराया जाता है। संध्या के समय होने वाली पूजा में कोहबर एवं भगवती गीतों की विशेष परंपरा है। नवविवाहिताएं इस पर्व के माध्यम से अपने पति की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और दांपत्य जीवन की मंगलकामना करती हैं।
सहरसा से विकास कुमार की रिपोर्ट