नीट छात्रा की मौत के मामले में सीबीआई को अब तक कोई ठोस सुराग नहीं मिला है। केंद्रीय जांच एजेंसी की सबसे बड़ी चुनौती छात्रा के कपड़े से मिले स्पर्म के डीएनए का उस आरोपी के डीएनए के सैंपल से मिलान करना है, जिसने उसके साथ घिनौनी हरकत की है। सूत्रों के अनुसार, जांच एजेंसी इस मामले में सच उगलवाने के लिए करीब 10 लोगों का पॉलीग्राफ टेस्ट करा सकती है। इसको लाय डिटेक्टर टेस्ट भी कहा जाता है। किसी भी व्यक्ति का यह टेस्ट कराने के लिए कोर्ट और आरोपी की सहमति जरूरी है।
इस बीच, केस टेकओवर करने के 12 दिन बाद सीबीआई सोमवार को एक बार फिर छात्रा के हॉस्टल पहुंची। सीबीआई हॉस्टल संचालिका और दो वार्डन के साथ गई थी। करीब दो घंटे तक सीबीआई हॉस्टल में रही। इस दौरान सीबीआई ने छात्रा के कमरे को देखा। उसे लड़के से भी पूछताछ की, जिसने छात्रा को सबसे पहले कमरे का दरवाजा तोड़कर बेहोशी की हालत में निकला था। साथ ही हॉस्टल के उस गार्ड को भी बुलाया है, जिसने छात्रा को गोद में लेकर नीचे उतारा था। सीबीआई एक बार फिर जहानाबाद जा सकती है। छात्रा के परिजनों से और भी जानकारियां ले सकती है। दूसरी तरफ सीबीआई ने छात्रा के मोबाइल का सीडीआर निकाल लिया है। उसे खंगाल रही है।
पॉलीग्राफ टेस्ट, जिसे लाय डिटेक्टर भी कहते हैं। किसी व्यक्ति के झूठ बोलने पर होने वाली शारीरिक प्रतिक्रियाओं को मापकर सच्चाई का पता लगाता है। इसमें व्यक्ति के शरीर से सेंसर जोड़कर हृदय गति, रक्तचाप, सांस और त्वचा की पसीने की गतिविधि रिकॉर्ड की जाती है, जबकि विशेषज्ञ उनसे अपराध से संबंधित सवाल पूछते हैं। टेस्ट करने वाला यनी पॉलीग्राफर प्रश्न पूछता है और कंप्यूटर स्क्रीन पर शारीरिक प्रतिक्रियाओं का ग्राफ रिकॉर्ड करता है।
सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशानुसार, किसी की सहमति के बिना पॉलीग्राफ टेस्ट नहीं किया जा सकता। यह उस व्यक्ति के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। इसके परिणाम सीधे सबूत के तौर पर अदालत में स्वीकार्य नहीं होते, लेकिन जांच में मदद ले सकते हैं।
पॉलीग्राफ मशीन से शारीरिक प्रतिक्रिया मापी जाती है, जबकि नाकों एनालिसिस टेस्ट में इंजेक्शन लगाकर व्यक्ति को अचेत अवस्था में सच बोलने के लिए मजबूर किया जाता है।