महंगाई और गैस किल्लत से परेशान लोग, दूसरे प्रदेशों से अपने गांव लौटने लगे प्रवासी बिहारी

बड़ी खबर हमारे समाज के उस हिस्से से जुड़ी है जो दिन-भर पसीना बहाकर देश का चक्का चलाता है, लेकिन आज वही मजदूर खुद को बेबस महसूस कर रहा है।

By : स्वराज पोस्ट | Edited By: Karishma Singh
Updated at : Mar 25, 2026, 1:17:00 PM

बड़ी खबर हमारे समाज के उस हिस्से से जुड़ी है जो दिन-भर पसीना बहाकर देश का चक्का चलाता है, लेकिन आज वही मजदूर खुद को बेबस महसूस कर रहा है।

मध्य-पूर्व में जारी युद्ध की तपिश अब हमारे देश की रसोई तक पहुँच गई है। गैस की भारी किल्लत ने प्रवासी बिहारी मजदूरों को एक बार फिर पलायन के लिए मजबूर कर दिया है। गुजरात, हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों से मजदूर अब भारी संख्या में अपने गांवों की ओर लौट रहे हैं।

गैस की कमी के कारण फैक्ट्रियों में काम ठप हो रहा है। इसका सीधा असर दिहाड़ी मजदूरों पर पड़ा है। आंकड़ों पर नजर डालें तो बिहार की आबादी का एक बड़ा हिस्सा, यानी करीब 3.50% लोग दूसरे प्रदेशों में रहकर अपना पेट पालते हैं।

गुजरात से गोपालगंज और सीवान जैसे इलाकों से आए मजदूरों का कहना है कि वहां 90 प्रतिशत तक फैक्ट्रियां बंद होने की कगार पर हैं। चाहे वो प्रिंटिंग प्रेस हो, होटल व्यवसाय हो या फिर मैन्युफैक्चरिंग यूनिट—गैस न होने की वजह से सब कुछ थम सा गया है।"इस संकट की तस्वीर उन चेहरों में साफ दिखती है जो पटना जंक्शन पर भारी मन से उतर रहे हैं।

अनिल चौहान, जो दिल्ली में मिठाई की दुकान पर काम करते थे, बताते हैं कि गैस महंगी और दुर्लभ होने की वजह से मालिक ने छुट्टी दे दी।

वहीं, संजय कुमार की आपबीती सुनकर दिल दहल जाता है, जिन्होंने गैस की कमी के कारण कई दिनों तक लकड़ियों पर खाना बनाया और आखिरकार हार मानकर घर लौटने का फैसला किया।

मजदूरों का कहना है कि उनकी दिहाड़ी का एक बड़ा हिस्सा अब सिर्फ गैस रिफिल कराने में खर्च हो रहा है। जहाँ ₹100 किलो मिलने वाली गैस अब ₹250 तक पहुँच गई है, वहां एक गरीब मजदूर अपने परिवार का पेट पाले या गैस खरीदे?"यह सिर्फ एक प्रशासनिक खामी नहीं है।

 अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जारी युद्ध ने सप्लाई चेन को तोड़ दिया है। लेकिन सवाल यह उठता है कि इस वैश्विक संकट की सबसे बड़ी कीमत हमारा गरीब मजदूर ही क्यों चुकाता है? लकड़ियों और कोयले के चूल्हे पर लौटने को मजबूर ये लोग क्या 'डिजिटल इंडिया' और 'उज्ज्वला योजना' के दौर में एक कदम पीछे नहीं जा रहे हैं?"आज सूरत हो या दिल्ली, हर तरफ से लौटते हुए इन कदमों में एक ही डर है—भविष्य का डर। सरकार को इस दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे, ताकि इन प्रवासियों को अपने ही घर में रोजगार मिल सके और उन्हें मजबूरी में फिर से पलायन न करना पड़े।