PMCH और AIIMS जैसे बड़े सरकारी अस्पतालों के पास फायर NOC नहीं, सुरक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल

बिहार के बड़े सरकारी अस्पतालों में फायर सेफ्टी को लेकर गंभीर लापरवाही सामने आई है। राजधानी पटना के सबसे बड़े अस्पतालों में शामिल पीएमसीएच, एनएमसीएच, एम्स, आईजीआईसी और आईजीआईएमएस के पास तक फायर सेफ्टी का एनओसी यानी अनापत्ति प्रमाण पत्र नहीं है

By : स्वराज पोस्ट | Edited By: Karishma Singh
Updated at : Mar 10, 2026, 9:32:00 AM

बिहार के बड़े सरकारी अस्पतालों में फायर सेफ्टी को लेकर गंभीर लापरवाही सामने आई है। राजधानी पटना के सबसे बड़े अस्पतालों में शामिल पीएमसीएच, एनएमसीएच, एम्स, आईजीआईसी और आईजीआईएमएस के पास तक फायर सेफ्टी का एनओसी यानी अनापत्ति प्रमाण पत्र नहीं है। ऐसे में अगर किसी भी अस्पताल में आग लग जाए तो वहां भर्ती मरीजों, उनके परिजनों और अस्पतालकर्मियों की जान खतरे में पड़ सकती है।

पटना जिले में कुल 487 अस्पताल हैं, जिनमें से 73 अस्पताल फायर सेफ्टी ऑडिट में फेल पाए गए हैं। जांच में सामने आया है कि कई अस्पतालों में आग से बचाव के लिए जरूरी बुनियादी सुविधाएं ही मौजूद नहीं हैं। कुछ जगहों पर आग लगने की स्थिति में बाहर निकलने के लिए रैंप, फायर लिफ्ट और बाहरी सीढ़ियां तक नहीं हैं।

कहीं फायर स्प्रिंकलर के वाल्व बंद पाए गए तो कहीं हाइड्रेंट सिस्टम पूरी तरह निष्क्रिय मिला। इमरजेंसी ब्लॉकों में लगे स्मोक डिटेक्टर और फायर अलार्म सिस्टम भी कई जगह खराब पड़े हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि फायर ब्रिगेड की तरफ से इन अस्पतालों को अभी तक एनओसी जारी नहीं की गई है।

इन अस्पतालों में बड़ी मात्रा में ऑक्सीजन सिलेंडर, ऑक्सीजन पाइपलाइन, एनेस्थीसिया गैस, केमिकल, प्लास्टिक और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण मौजूद रहते हैं। ऐसे में आग लगने का खतरा और भी बढ़ जाता है। आईजीआईसी में तो स्थिति और भी गंभीर है, जहां हेवी जेनरेटर सेट के ठीक बगल में चाय की दुकान चल रही है।

पड़ताल में यह भी सामने आया कि पीएमसीएच और आईजीआईएमएस जैसे बड़े अस्पतालों में फायर अलार्म सिस्टम तक बंद पड़े हैं। पीएमसीएच की पुरानी बिल्डिंग में अब भी मरीजों का इलाज जारी है, जबकि वहां आपातकालीन निकास और आग बुझाने की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। कई इमरजेंसी एग्जिट गेट भी बंद पाए गए हैं।

अस्पतालों में इस तरह की खामियां बेहद गंभीर मामला है। विशेषज्ञों का कहना है कि अग्निशमन विभाग को तुरंत अस्पताल प्रशासन के साथ बैठक करनी चाहिए और फायर सेफ्टी के नियमों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करना चाहिए। साथ ही हर तीन या छह महीने पर नियमित फायर ड्रिल भी कराई जानी चाहिए, ताकि अस्पतालों में काम करने वाले लोग और मरीज किसी भी आपात स्थिति के लिए तैयार रह सकें।