बिहार औद्योगिक क्षेत्र विकास प्राधिकरण ने राज्य में उद्योगों के विस्तार और निवेश प्रक्रिया को अधिक आधुनिक एवं पारदर्शी बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने "बियाडा लैंड अलॉटमेंट एंड मैनेजमेंट पॉलिसी 2026" को लागू कर दिया है, जिसके बाद वर्ष 2022 की पूर्व नीति स्वतः समाप्त मानी जाएगी। नई व्यवस्था का केंद्र बिंदु डिजिटल प्रक्रिया और निवेशकों के लिए आसान भूमि आवंटन प्रणाली है।
नई नीति के तहत औद्योगिक भूखंडों और शेडों का पूरा आवंटन अब ऑनलाइन माध्यम से किया जाएगा। निवेशक बियाडा पोर्टल पर उपलब्ध खाली भूखंडों की जानकारी देखकर सीधे आवेदन कर सकेंगे। सरकार का दावा है कि इससे प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ेगी और आवंटन के दौरान मानवीय हस्तक्षेप कम होगा।
उद्योग विभाग के सचिव सह बियाडा के प्रबंध निदेशक कुंदन कुमार के अनुसार, औद्योगिक क्षेत्रों के विकास के लिए भूमि उपयोग का नया ढांचा तैयार किया गया है। इसके अंतर्गत कुल उपलब्ध क्षेत्रफल का लगभग 55 से 65 प्रतिशत हिस्सा औद्योगिक इकाइयों के लिए सुरक्षित रखा जाएगा, जबकि बाकी जमीन सड़क, हरित पट्टी, सामाजिक सुविधाओं और वाणिज्यिक गतिविधियों के लिए निर्धारित होगी। सरकार ने प्रमुख और व्यावसायिक दृष्टि से महत्वपूर्ण भूखंडों के लिए ई-ऑक्शन की व्यवस्था भी लागू की है, ताकि प्रतिस्पर्धात्मक और निष्पक्ष आवंटन सुनिश्चित किया जा सके। साथ ही औद्योगिक क्षेत्रों को उनकी उपलब्ध भूमि और उपयोग के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित किया गया है।
नीति में निवेशकों को आर्थिक राहत देने की भी कोशिश दिखाई देती है। छोटे निवेश वाली परियोजनाओं के लिए अग्रिम भुगतान का प्रतिशत अधिक रखा गया है, जबकि बड़े निवेशकों को अपेक्षाकृत कम प्रारंभिक भुगतान करना होगा। 50 लाख रुपये तक की परियोजनाओं में 40 प्रतिशत अग्रिम राशि देनी होगी, जबकि 7.5 करोड़ रुपये से ऊपर के निवेश पर यह सीमा घटाकर 25 प्रतिशत कर दी गई है। शेष भुगतान 10 किस्तों में करने की सुविधा दी गई है, जिस पर 9 प्रतिशत साधारण ब्याज लागू होगा। राज्य में पंजीकृत स्टार्टअप कंपनियों को अर्नेस्ट मनी डिपॉजिट में विशेष राहत देकर नए उद्यमियों को आकर्षित करने की रणनीति अपनाई गई है।
सरकार ने औद्योगिक इकाइयों के संचालन को लेकर समय-सीमा भी तय कर दी है। सूक्ष्म उद्योगों को एक वर्ष के भीतर उत्पादन शुरू करना होगा, जबकि लघु, मध्यम और बड़े उद्योगों के लिए क्रमशः 18, 24 और 30 महीने की अवधि निर्धारित की गई है। यदि कोई इकाई तय समय में कार्य प्रारंभ नहीं करती या उसकी उत्पादन क्षमता 50 प्रतिशत से कम रहती है, तो उसे गैर-कार्यशील श्रेणी में रखकर अतिरिक्त शुल्क लगाया जाएगा।
नई नीति की एक महत्वपूर्ण विशेषता “सरेंडर और एग्जिट मैकेनिज्म” भी है। इसके माध्यम से लंबे समय से निष्क्रिय पड़ी औद्योगिक जमीन को वापस लेकर दूसरे निवेशकों को उपलब्ध कराया जा सकेगा। सरकार का मानना है कि इससे भूमि का बेहतर उपयोग सुनिश्चित होगा और बंद पड़ी परियोजनाओं की समस्या कम होगी।
इसके अतिरिक्त "प्लग-एंड-प्ले" मॉडल को बढ़ावा दिया गया है, जिसमें पहले से विकसित शेड उपलब्ध कराए जाएंगे ताकि उद्योग तुरंत उत्पादन शुरू कर सकें। इन शेडों का प्रारंभिक आवंटन पांच वर्षों के लिए होगा, जिसे बाद में बढ़ाकर 15 वर्ष तक किया जा सकेगा। नीति में उद्योगों के हस्तांतरण, उत्पाद बदलाव और विलय संबंधी प्रक्रियाओं को भी पहले की तुलना में सरल बनाया गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि नई औद्योगिक नीति बिहार में निवेश का माहौल मजबूत करने के साथ-साथ रोजगार के नए अवसर पैदा करने में अहम भूमिका निभा सकती है।