बिहार कृषि विश्वविद्यालय में नियुक्तियों पर घिरा प्रशासन, कुलपति पर पक्षपात और वित्तीय अनियमितताओं के आरोप

बिहार कृषि विश्वविद्यालय में नियुक्तियों पर घिरा प्रशासन, कुलपति पर पक्षपात और वित्तीय अनियमितताओं के आरोप

By : स्वराज पोस्ट | Edited By: Urvashi
Updated at : Apr 03, 2026, 5:10:00 PM

बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर (भागलपुर) इन दिनों गंभीर आरोपों के चलते विवादों के केंद्र में है। विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. दुनिया राम सिंह पर नियुक्ति प्रक्रियाओं में कथित अनियमितताओं, वित्तीय गड़बड़ियों और प्रशासनिक दुरुपयोग के आरोप लगाए गए हैं। इन मुद्दों को लेकर 26 सितंबर 2025 को साक्ष्यों सहित राज्य के मुख्यमंत्री और राज्यपाल (कुलाधिपति) को अवगत कराया गया था, लेकिन अब तक किसी ठोस जांच या कार्रवाई का अभाव सवाल खड़े कर रहा है।

हाल के आरोपों में सबसे प्रमुख मामला कथित रूप से पारिवारिक पक्षपात से जुड़ा है। आरोप है कि कुलपति ने अपनी पुत्री को विश्वविद्यालय के इन्क्यूबेशन सेंटर में व्यवसाय प्रबंधक के पद पर नियुक्त कराने के लिए पात्रता मानदंड और वेतन संरचना में बदलाव किया। बताया जाता है कि इस पद का मानदेय कई गुना बढ़ाया गया और नियुक्ति के बाद भी नियमित उपस्थिति न होने के बावजूद भुगतान जारी रहा।

एक अन्य विवाद संविदा आधारित सेवाओं से जुड़ा है। आरोप है कि मानव संसाधन उपलब्ध कराने वाली एक निजी एजेंसी में कुलपति के परिजनों की हिस्सेदारी है। निविदा प्रक्रिया में पारदर्शिता पर सवाल उठाते हुए कहा गया है कि बेहतर प्रस्तावों को नजरअंदाज कर संबंधित एजेंसी को चयनित किया गया। साथ ही, इस एजेंसी द्वारा कर्मचारियों के वेतन से अवैध कटौती कर धन के दुरुपयोग का भी आरोप सामने आया है।

नियुक्तियों में गड़बड़ी के आरोप भी कम गंभीर नहीं हैं। कृषि विज्ञान केंद्रों में विषय विशेषज्ञों की भर्ती के दौरान विज्ञापित पदों से अधिक नियुक्तियां किए जाने और मेरिट सूची में हेरफेर कर पसंदीदा उम्मीदवारों को अवसर देने की बात कही जा रही है। इसी तरह, आरक्षण नियमों के पालन में भी अनियमितता के आरोप लगे हैं, जिनमें विभिन्न श्रेणियों के पदों पर गलत तरीके से चयन किए जाने का दावा किया गया है।

यह भी आरोप है कि राज्य सरकार द्वारा नियुक्तियों पर रोक के निर्देश के बावजूद विश्वविद्यालय में महत्वपूर्ण पदों पर चयन प्रक्रिया जारी रखी गई। साथ ही, विश्वविद्यालय में उपकरणों की खरीद, परियोजनाओं के संचालन और अनुसंधान कार्यों में भी वित्तीय अनियमितताओं के संकेत मिले हैं। एक महंगे वैज्ञानिक उपकरण की खरीद में निर्धारित प्रक्रिया का पालन न करने और बिना प्रशिक्षण के भुगतान जारी करने का मामला भी उठाया गया है।

अनुसंधान गतिविधियों को लेकर भी सवाल खड़े किए गए हैं। आरोप है कि पेटेंट के नाम पर विश्वविद्यालय के संसाधनों का उपयोग कर व्यक्तिगत लाभ उठाया गया, जबकि संस्थान को अपेक्षित उपलब्धि नहीं मिल सकी। इसके अलावा, कुछ परियोजनाओं में एक विशेष क्षेत्र से जुड़े लोगों को प्राथमिकता देने की बात भी सामने आई है।

इस पूरे मामले में यह भी उल्लेखनीय है कि कुलपति के खिलाफ पूर्व संस्थान में भी जांच की बात सामने आई है, जिससे उनकी कार्यशैली पर और संदेह गहराया है। वहीं, विश्वविद्यालय में पहले से विवादों में रहे कुछ अधिकारियों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दिए जाने पर भी सवाल उठे हैं।

हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि और निष्पक्ष जांच अभी लंबित है, लेकिन लगातार सामने आ रहे मामलों ने विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। अब नजर इस बात पर है कि राज्य सरकार और संबंधित प्राधिकरण इन आरोपों की जांच को किस दिशा में आगे बढ़ाते हैं और क्या जवाबदेही तय होती है।