गोपालगंज. उत्तर प्रदेश सीमा से सटे गोपालगंज जिले के भोरे थाना की स्थिति प्रशासनिक उदासीनता का जीता-जागता उदाहरण बन गया है. एक तरफ जहाँ राज्य में सुशासन और विकास के दावे किए जाते हैं, वहीं भोरे थाने का भवन आज भी अपनी जर्जर और दयनीय हालत पर आँसू बहा रहा है. बिहार में सत्ता बदली लेकिन भोरे थाने की सूरत नहीं बदली। यहाँ कार्यरत पुलिसकर्मियों के लिए हालात आज भी जस के तस बने हुए हैं.
मिली जानकारी के अनुसार भोरे थाने के पुलिसकर्मी हर दिन जान जोखिम में डालकर अपनी ड्यूटी कर रहे हैं. भवन इतना अधिक जर्जर हो चुका है कि यह कभी भी किसी बड़ी दुर्घटना का संकेत दे सकता है. बरसात के दिनों में थाने के कर्मचारियों के लिए रात गुजारना किसी यातना से कम नहीं होता. छत से पानी टपकने के कारण उन्हें कमरे में खड़े होकर रातें बितानी पड़ती हैं, जिससे उनके कार्य और आराम पर गंभीर असर पड़ता है. थाने में जब्त किए गए वाहनों के बीच और आस-पास अक्सर साँप और बिच्छू रेंगते पाए जाते हैं, जिससे पुलिसकर्मियों और आगंतुकों, दोनों के लिए खतरा बना रहता है.
थाना परिसर की अनदेखी का आलम यह है कि कभी थाने के अंदर स्थित एक पोखरा अब घनी झाड़ियों के कारण पूरी तरह से लुप्त हो चुका है. यह न केवल परिसर की बदहाली दर्शाता है, बल्कि मच्छरों और अन्य कीटाणुओं के पनपने का भी कारण बनता है. कई बार पुलिस कई बार पुलिस डेंगू के शिकार हो चुके हैं. स्थानीय लोगों और पुलिसकर्मियों ने कभी भोरे थाने को 'मॉडल थाना' बनने का सपना देखा था. लेकिन, प्रशासनिक उदासीनता और पुलिस भवन निर्माण विभाग की कथित लापरवाही के कारण यह सपना आज तक साकार नहीं हो पाया है. सीमावर्ती इलाके का इतना महत्वपूर्ण थाना होने के बावजूद, यह आज भी अपने नवनिर्माण का इंतजार कर रहा है.
भोरे थाने की यह बदहाली न केवल यहाँ कार्यरत कर्मियों के मनोबल को गिराती है, बल्कि क्षेत्र की कानून-व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करती है. इस गंभीर समस्या के समाधान के लिए राज्य सरकार और पुलिस के वरीय अधिकारियों को तत्काल हस्तक्षेप करने और इस थाने के नवनिर्माण की दिशा में ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है।
गोपालगंज से कुमार प्रदीप की रिपोर्ट