सुप्रीम कोर्ट ने रियल एस्टेट नियामक प्राधिकरण (रेरा) के औचित्य पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा है कि यह संस्था अपने उद्देश्य में सफल नहीं हुई। यह पीड़ितों के बजाय डिफॉल्टर बिल्डर की मदद कर रही है।
हिमाचल सरकार के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए सीजेआई सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि राज्यों को यह सोचना चाहिए कि रेरा का गठन क्यों किया गया था? जिन लोगों के लिए रेरा बनाया गया था, वे 'पूरी तरह निराश और हताश' हैं। इस संस्था को खत्म कर दिया जाए तो उन्हें कोई दिक्कत नहीं होगी
आदेश देने के अधिकार, मनवाने के नहींः रेरा कानून में आदेशों के क्रियान्वयन की प्रक्रिया तय नहीं है। सिविल रिकवरी की प्रक्रिया है, जो कलेक्टर को भेजे जाते हैं। बिल्डर लॉबी हावीः बिल्डरों से जुड़े विवादों के समाधान के लिए मजबूत और व्यवस्थित सिस्टम नहीं। बिल्डर लॉबी पर नकेल कसने में नाकामयाब।
जहां अधिकार हैं, वहां उपयोग नहींः धारा 8 के तहत प्रोजेक्ट को समय पर पूर्ण कराने के लिए नियामक अधिकार हैं। पर व्यावहारिक जांच के लिए पर्याप्त अमला नहीं। कानूनों में एकरूपता नहींः हर राज्य के रेरा के नियम दूसरे से अलग। राज्य अपने-अपने नियम बनाते हैं। कई रेरा की मूल भावना के विपरीत।