तेजस्वी और ओवैसी समीकरण से बिहार में सियासी भूचाल, ‘बी टीम’ से गठजोड़, क्या राजनीतिक भूल?

बिहार राज्यसभा चुनाव में AIMIM विधायकों का तेजस्वी यादव के उम्मीदवार को समर्थन बड़ा सियासी संदेश दे रहा है। जिस ओवैसी को कभी बीजेपी की ‘बी टीम’ कहा जाता था, आज उसी से हाथ मिलाने पर सवाल उठ रहे हैं।

तेजस्वी और ओवैसी

Kanhaiya Bhelari  Editor-in-Chief Swaraj Post की कलम से

बिहार राज्यसभा चुनाव में AIMIM विधायकों का तेजस्वी यादव के उम्मीदवार को समर्थन बड़ा सियासी संदेश दे रहा है। जिस ओवैसी को कभी बीजेपी की ‘बी टीम’ कहा जाता था, आज उसी से हाथ मिलाने पर सवाल उठ रहे हैं। क्या यह महज राजनीतिक रणनीति है या बदलते समीकरणों का संकेत? बिहार की राजनीति में नई बहस छिड़ गई है।

आज की राजनीति का केंद्र कहीं न कहीं Tejashwi Yadav बनते दिख रहे हैं। हाल के घटनाक्रम को देखें तो साफ लगता है कि बिहार की राजनीति एक नए मोड़ पर खड़ी है, जहां विचारधारा से ज्यादा सत्ता की गणित हावी होती जा रही है।

सबसे पहले बात करते हैं उस मुद्दे की, जिसने राजनीतिक हलकों में बहस छेड़ दी है—AIMIM के साथ समझौता। वही AIMIM, जिसे कभी तेजस्वी यादव ने खुले मंच से बीजेपी की “बी टीम” कहा था। लेकिन अब, जब राज्यसभा चुनाव की बात आई, तो उसी पार्टी के साथ तालमेल की खबर सामने आई। सवाल उठता है—क्या यह सिर्फ रणनीति है या एक वैचारिक चूक?

राजनीति में रणनीति बदलना कोई नई बात नहीं है। लेकिन जब आप सार्वजनिक रूप से किसी दल के खिलाफ स्टैंड लेते हैं और फिर उसी के साथ खड़े हो जाते हैं, तो आपकी विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। यही बात अब लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है।

एक और बड़ी बात जो सामने आती है, वो यह कि आज उनकी टीम में वो अनुभव नहीं दिखता, जो पहले की राजनीति में हुआ करता था। पहले नेताओं के साथ अनुभवी सलाहकार होते थे—ऐसे लोग जो दूरदर्शिता रखते थे, जिनकी सोच गहरी होती थी। आज की राजनीति में युवा नेतृत्व तो है, लेकिन उस “पॉलिटिकल विजडम” की कमी महसूस होती है।

हालांकि, यह भी सच है कि आज का दौर डिजिटल है। फैसले तेजी से लिए जाते हैं, और राजनीतिक समीकरण भी उतनी ही तेजी से बदलते हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि विचारधारा को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया जाए।

अगर आप आज AIMIM के साथ हैं, जिसे आपने कभी बीजेपी की बी टीम कहा था, तो कल आप बीजेपी के साथ भी जा सकते हैं—यह सवाल अब जनता के बीच उठने लगा है। और यह सवाल सिर्फ विरोधी नहीं उठा रहे, बल्कि उनके अपने दल के कुछ नेता भी इस पर चिंता जता चुके हैं।

बिहार की राजनीति में यह कोई पहली बार नहीं हो रहा है। इतिहास गवाह है कि गठबंधन और टूट-फूट हमेशा से राजनीति का हिस्सा रहे हैं। Lalu Prasad Yadav की सरकार भी कभी बीजेपी के समर्थन से बनी थी। बाद में रास्ते अलग हुए। इसी तरह George Fernandes, Sharad Yadav जैसे नेता भी समय के साथ अपने-अपने राजनीतिक फैसले बदलते रहे।

आज की राजनीति में एक चीज साफ है—“पावर ही प्राथमिकता है।” विचारधारा पीछे छूटती जा रही है। अगर सत्ता की गारंटी कहीं से मिलती है, तो राजनीतिक दल वहां जाने में हिचकिचाते नहीं हैं।

अब बात करते हैं वोट बैंक की। तेजस्वी यादव के पास यादव और मुस्लिम वोट बैंक एक मजबूत आधार के रूप में मौजूद है। यादव वोट करीब 15% माना जाता है, जिसमें से 12-13% उनका मजबूत आधार है। अगर बीजेपी कहीं से अतिरिक्त वोट जुटा लेती है, तो क्या वह लव-कुश समीकरण को छोड़ देगी? यह भी एक बड़ा सवाल है।

राजनीति अब पूरी तरह से गणित और मैनेजमेंट का खेल बनती जा रही है। कौन किसके साथ जाएगा, यह अब विचारधारा नहीं, बल्कि परिस्थितियां तय कर रही हैं।

लेकिन इस सबके बीच सबसे बड़ा सवाल वही है—जनता कहां है? क्या उनकी समस्याएं, जैसे महंगाई, बेरोजगारी, गैस सिलेंडर की कीमतें, वास्तव में राजनीतिक एजेंडा बन पा रही हैं?

दूसरी तरफ, जनता के असली मुद्दे क्या हैं? आज भी आम आदमी गैस सिलेंडर की कीमतों से परेशान है। हर घर में महंगाई की मार महसूस हो रही है। लोग सड़कों पर उतरना चाहते हैं, लेकिन राजनीतिक दल इन मुद्दों को लेकर उतने सक्रिय नहीं दिखते, जितना उन्हें होना चाहिए।

इसी बीच, Nitish Kumar की “समृद्धि यात्रा” भी चर्चा में है। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये यात्राएं वास्तव में जनता की समस्याओं का समाधान कर रही हैं या सिर्फ एक राजनीतिक अभियान बनकर रह गई हैं? लखीसराय में आलू-प्याज बांटने की चर्चा हो रही है, लेकिन क्या इससे गैस, रोजगार और महंगाई जैसे मुद्दों का हल निकलता है?

आने वाले समय में शायद नेता जनता के बीच जाएंगे, यात्राएं करेंगे, संवाद करेंगे। लेकिन कब और कैसे—यह अभी स्पष्ट नहीं है।

अंत में, यही कहना है कि बिहार की राजनीति एक बदलाव के दौर से गुजर रही है। यहां हर दिन नए समीकरण बन रहे हैं, और पुराने टूट रहे हैं। ऐसे में जनता को सजग रहना होगा और हर फैसले को समझदारी से देखना होगा। आज के लिए बस इतना ही

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