पोस्टर और प्रचार से नहीं, जनता के भरोसे चलती है सरकार : आलोक दूबे
पोस्टर और प्रचार से नहीं, जनता के भरोसे चलती है सरकार : आलोक दूबे
झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के महासचिव आलोक कुमार दूबे ने केंद्रीय रक्षा राज्य मंत्री संजय सेठ द्वारा प्रधानमंत्री स्वनिधि योजना की उपलब्धियों को लेकर दिए गए बयान पर तीखा पलटवार करते हुए कहा कि भाजपा सरकार की सबसे बड़ी कला है—"ढोल इतना जोर से बजाओ कि जनता की आवाज़ सुनाई ही न दे।"
दूबे ने कहा कि संजय सेठ देश को आंकड़ों का आईना दिखा रहे हैं, लेकिन देश की जनता रोज़मर्रा की जिंदगी में महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक संकट का सामना कर रही है। कहावत है—"हाथी के दांत खाने के और, दिखाने के और होते हैं।" भाजपा सरकार भी कुछ ऐसा ही कर रही है।
सरकार ऋण वितरण के आंकड़े गिना रही है, लेकिन यह नहीं बता रही कि कितने छोटे व्यापारी आज भी बढ़ती लागत, घटती आमदनी और बाजार की अनिश्चितता से परेशान हैं। केवल ऋण बांट देना ही सफलता नहीं है, बल्कि लोगों को आर्थिक रूप से स्थायी और आत्मनिर्भर बनाना असली सफलता है। आलोक दूबे ने तंज कसते हुए कहा,
"लफ्ज़ों से तस्वीरें बनाना आसान होता है,
हकीकत के आईने में उतरना मुश्किल होता है।
जो सरकार हर बात में उत्सव मनाती है,
उसे जनता के सवालों का जवाब देना मुश्किल होता है।"
उन्होंने कहा कि भाजपा के नेता आंकड़ों की माला जप रहे हैं, लेकिन देश की जनता पूछ रही है कि आखिर बेरोजगारी, महंगाई और छोटे कारोबारियों की परेशानियों पर सरकार कब बोलेगी? दूबे ने कहा कि "वाह संजय सेठ जी! देश की जनता आपसे जवाब मांगेगी और जवाब केवल आपको ही नहीं, आपके आलाकमान को भी देना होगा।" क्योंकि लोकतंत्र में सरकारें विज्ञापनों से नहीं, जनता के भरोसे से चलती हैं।
उन्होंने कहा कि एक पुरानी कहावत है, "खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे।" जब जमीनी सवालों का जवाब नहीं होता, तब सरकारें उपलब्धियों के चमकदार पोस्टर दिखाने लगती हैं। लेकिन देश की जनता अब पोस्टर नहीं, वास्तविक परिणाम देखना चाहती है। सरकार को आत्मप्रशंसा छोड़कर जनता के वास्तविक सवालों का जवाब देना होगा। क्योंकि,
"सिर्फ़ दावे करने से मंज़िल नहीं मिलती,
हकीकत की राह पर चलना पड़ता है।
जनता सब देख रही है साहब,
एक दिन पूरा हिसाब देना पड़ता है।"