झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) द्वारा आयोजित सहायक वन संरक्षक मुख्य परीक्षा में सामने आई गंभीर त्रुटियों ने न केवल अभ्यर्थियों को परेशान किया है, बल्कि राज्य की राजनीति को भी गरमा दिया है। इस मुद्दे पर नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने राज्य सरकार पर तीखा प्रहार करते हुए परीक्षा की निष्पक्षता और आयोग की कार्यशैली पर सवाल खड़े किए हैं।
मरांडी ने सोशल मीडिया के जरिए अपनी प्रतिक्रिया देते हुए परीक्षा की गुणवत्ता पर गंभीर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि जिस प्रश्नपत्र में सैकड़ों गलतियां हों, वह पूरी प्रक्रिया पर ही सवाल खड़ा करता है। उनके अनुसार, यह स्थिति केवल लापरवाही का परिणाम नहीं, बल्कि व्यवस्था में गहरी खामियों का संकेत है। उन्होंने आरोप लगाया कि जब नियुक्तियों और चयन प्रक्रिया पर पहले से ही संदेह हो, तो ऐसी घटनाएं परीक्षा की विश्वसनीयता को और कमजोर करती हैं।
दरअसल, 6 अप्रैल 2026 को आयोजित इस मुख्य परीक्षा में कुल 78 पदों के लिए अभ्यर्थियों ने हिस्सा लिया था। 200 अंकों के हिंदी प्रश्नपत्र में कई बुनियादी शब्दों की वर्तनी गलत पाई गई। ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भों से जुड़े नामों तक में त्रुटियां थीं। उदाहरण के तौर पर, ‘सिद्धू-कान्हू’ को गलत तरीके से ‘सिडो-कान्हू’ लिखा गया, जबकि ‘ऐतिहासिक’, ‘गठन’ और ‘मुख्य’ जैसे सामान्य शब्द भी गलत रूप में छपे। इसके अलावा कई अन्य शब्दों और वाक्यों में भी गंभीर त्रुटियां देखी गईं, जिससे परीक्षार्थियों को प्रश्न समझने में दिक्कतों का सामना करना पड़ा।
अभ्यर्थियों का कहना है कि इस तरह की गलतियां परीक्षा की गुणवत्ता और पारदर्शिता दोनों पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं। उनका मानना है कि जब प्रश्न ही स्पष्ट नहीं होंगे, तो मूल्यांकन की निष्पक्षता कैसे सुनिश्चित की जा सकती है।
इस पूरे मामले को लेकर मरांडी ने सरकार से कड़ी कार्रवाई की मांग की है। उन्होंने JPSC के नेतृत्व और नियुक्तियों पर भी सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण आयोग की साख प्रभावित हो रही है। उन्होंने मुख्यमंत्री से आग्रह किया कि मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कदम उठाए जाएं।
विवाद बढ़ने के साथ ही JPSC की कार्यप्रणाली एक बार फिर बहस के केंद्र में आ गई है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाती है और अभ्यर्थियों की चिंताओं का समाधान किस तरह किया जाता है।