नीतीश युग का पटाक्षेप, अब सम्राट चौधरी के हाथों में बिहार की बागडोर

नीतीश युग का पटाक्षेप, अब सम्राट चौधरी के हाथों में बिहार की बागडोर

नीतीश युग का पटाक्षेप, अब सम्राट चौधरी के हाथों में बिहार की बागडोर
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By : स्वराज पोस्ट | Edited By: Urvashi
: Apr 14, 2026, 4:50:00 PM

बिहार की राजनीति में एक अहम मोड़ आ गया है। लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे नीतीश कुमार ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है, जिसके साथ ही राज्य में एक नए राजनीतिक अध्याय की शुरुआत हो रही है। भारतीय जनता पार्टी ने अपने विधायक दल की बैठक में सम्राट चौधरी को नेता चुना है और अब वे मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने जा रहे हैं। इस बदलाव को राज्य की राजनीति में ‘नीतीश युग’ के अंत और ‘सम्राट युग’ के उदय के रूप में देखा जा रहा है।

नए मुख्यमंत्री के रूप में चुने जाने के बाद सम्राट चौधरी ने पार्टी नेतृत्व के प्रति आभार जताते हुए इसे बड़ी जिम्मेदारी बताया। उन्होंने कहा कि यह पद उनके लिए केवल सत्ता का प्रतीक नहीं, बल्कि बिहार की जनता की उम्मीदों को पूरा करने का अवसर है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि वे पूरी ईमानदारी और समर्पण के साथ लोगों की सेवा करेंगे।

सम्राट चौधरी का राजनीतिक सफर विरासत और संघर्ष दोनों का मिश्रण रहा है। उनका जन्म 16 नवंबर 1968 को मुंगेर जिले के लखनपुर में हुआ था। उनके पिता शकुनी चौधरी बिहार की राजनीति में एक जाना-पहचाना नाम रहे हैं और समता पार्टी से जुड़े थे। पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण राजनीति से उनका जुड़ाव शुरू से रहा, हालांकि उनके शैक्षणिक रिकॉर्ड को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। इसके बावजूद उन्हें मानद उपाधि भी प्राप्त हो चुकी है।

उनकी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत राष्ट्रीय जनता दल से हुई थी। 1990 के दशक में सक्रिय राजनीति में आए और 1999 में राबड़ी देवी सरकार में मंत्री बने। हालांकि उस समय वे किसी सदन के सदस्य नहीं थे, जिसके चलते उन्हें पद छोड़ना पड़ा। इसके बाद उन्होंने विधानसभा चुनाव जीतकर अपनी स्थिति मजबूत की और परबत्ता क्षेत्र से दो बार विधायक बने।

राजनीतिक परिस्थितियों के बदलने के साथ उन्होंने कई बार अपनी रणनीति बदली। एक समय उन्होंने जदयू का दामन थामा और जीतनराम मांझी के नेतृत्व वाले गुट के साथ भी जुड़े रहे। इस दौरान उन्हें राज्य सरकार में मंत्री पद भी मिला। हालांकि बाद में वे हाशिए पर चले गए, लेकिन 2018 में भाजपा में शामिल होने का उनका फैसला उनके करियर का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ।

भाजपा में आने के बाद उनका कद तेजी से बढ़ा। पहले उन्हें प्रदेश उपाध्यक्ष बनाया गया, फिर विधान परिषद का सदस्य चुना गया। 2023 में उन्हें प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई और 2024 में वे उपमुख्यमंत्री और वित्त मंत्री बने। इसके बाद 2025 में विधानसभा चुनाव जीतकर उन्होंने अपनी राजनीतिक पकड़ और मजबूत की। अब 2026 में मुख्यमंत्री पद तक पहुंचना उनके राजनीतिक उत्थान का बड़ा उदाहरण माना जा रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, भाजपा का यह फैसला सामाजिक समीकरणों को साधने की रणनीति का हिस्सा है। बिहार की राजनीति में जातीय संतुलन हमेशा महत्वपूर्ण रहा है। नीतीश कुमार जहां कुर्मी समुदाय से आते हैं, वहीं सम्राट चौधरी कुशवाहा (कोइरी) समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं। इन दोनों समुदायों का संयुक्त प्रभाव राज्य की राजनीति में अहम माना जाता है।

इसके अलावा, सुशील कुमार मोदी के निधन के बाद भाजपा को राज्य में एक प्रभावशाली चेहरे की आवश्यकता थी, जो संगठन और सत्ता दोनों को संतुलित कर सके। सम्राट चौधरी ने पिछले कुछ वर्षों में पार्टी के भीतर अपनी पकड़ मजबूत कर इस भूमिका के लिए खुद को स्थापित किया।