दरभंगा से एक बेहद दुखद खबर सामने आ रही है ...मिथिला की धरती ने आज अपने इतिहास का एक अहम हिस्सा खो दिया है। दरभंगा राजघराने की अंतिम महारानी, महारानी कामसुंदरी देवी का निधन हो गया है। 96 वर्ष की उम्र में उन्होंने दरभंगा स्थित कल्याणी निवास में अंतिम सांस ली। इस खबर के साथ ही 491 साल पुराने दरभंगा राज का आखिरी जीवित अध्याय भी खत्म हो गया।
महारानी कामसुंदरी देवी दरभंगा के अंतिम महाराजा महाराजा कामेश्वर सिंह की तीसरी पत्नी थीं। उन्होंने वो दौर देखा, जब दरभंगा राज अपने वैभव के लिए जाना जाता था और वो समय भी देखा, जब जमींदारी प्रथा खत्म हुई और देश आज़ादी के बाद एक नए रास्ते पर बढ़ा। उनका जीवन खुद में इतिहास का एक लंबा सफर रहा।
दरभंगा राज सिर्फ एक राजघराना नहीं था। यह मिथिला की शिक्षा, संस्कृति और संस्कृत परंपरा का बड़ा केंद्र रहा है। मिथिला विश्वविद्यालय हो, संस्कृत शिक्षा हो या सामाजिक संस्थान, इन सबके पीछे दरभंगा राज की बड़ी भूमिका रही है। महारानी कामसुंदरी देवी उस पूरे दौर की आखिरी जीवित गवाह थीं। उनके जाने के साथ ही अब दरभंगा राज पूरी तरह इतिहास के पन्नों में सिमट गया है।
महारानी कामसुंदरी देवी का जीवन काफी सादा और शांत रहा। उन्होंने कभी खुद को सुर्खियों में नहीं रखा। न कोई दिखावा, न कोई राजनीतिक बयानबाजी। वे हमेशा गरिमा और मर्यादा के साथ रहीं। यही वजह है कि मिथिला समाज में उन्हें हमेशा सम्मान की नजर से देखा गया। लोग उन्हें एक शांत, संयमित और संस्कारी व्यक्तित्व के रूप में याद करते हैं।
जैसे ही उनके निधन की खबर सामने आई, दरभंगा, मधुबनी और पूरे मिथिला क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई। राजघराने से जुड़े लोग हों या आम नागरिक, हर कोई इस खबर से भावुक नजर आया। क्योंकि यह सिर्फ एक महारानी के निधन की खबर नहीं है, यह उस इतिहास के खत्म होने की खबर है, जिसे लोगों ने जीते-जागते देखा था।
कई सामाजिक और राजनीतिक हस्तियों ने उनके निधन पर दुख जताया है। सभी ने यही कहा कि महारानी कामसुंदरी देवी मिथिला की पहचान का हिस्सा थीं। उनके व्यक्तित्व में कभी सत्ता का घमंड नहीं दिखा, बल्कि संस्कार और सादगी साफ नजर आती थी। यही कारण है कि बदलते समय में भी उनका सम्मान बना रहा।
दरभंगा राज की कहानी सिर्फ राजसी ठाठ-बाट की नहीं है। यह कहानी शिक्षा, संस्कृति और सामाजिक जिम्मेदारी की भी है। महारानी कामसुंदरी देवी ने अपने जीवन में देश के बड़े बदलाव देखे। आज़ादी के बाद का भारत, समाज में आए परिवर्तन और लोकतंत्र की मजबूती — ये सब उनके सामने घटा। वे उस पीढ़ी की थीं, जिसने इतिहास को किताबों में नहीं, बल्कि अपनी आंखों के सामने बदलते देखा।।
आज दरभंगा की पुरानी इमारतें, राजमहल और विरासतें खामोश हैं। ऐसा लगता है जैसे इतिहास खुद कुछ पल के लिए ठहर गया हो। महारानी कामसुंदरी देवी का जाना हमें यह याद दिलाता है कि समय किसी के लिए नहीं रुकता, लेकिन कुछ लोग अपने पीछे ऐसी छाप छोड़ जाते हैं, जो हमेशा याद रखी जाती है।
मिथिला ने आज सिर्फ एक महारानी को नहीं खोया है, बल्कि अपने अतीत की आखिरी जीवित पहचान को खो दिया है। महारानी कामसुंदरी देवी का नाम दरभंगा राज के इतिहास में हमेशा सम्मान और गरिमा के साथ लिया जाएगा। ईश्वर दिवंगत आत्मा को शांति दे।