तेजस्वी यादव की विदाई की शुरुआत है प्रशांत पांडे का आगमन!

बिहार की राजनीति तेजी से करवट बदल रही है। नये लोग आ रहे हैं तो पुराने लोगों के अस्तित्व पर संकट गहरा रहा है। बांकीपुर जैसी सीट पर भाजपा चुनाव हार जा रही है और राजद जैसी पार्टी चुनाव का खानापूर्ति करने को विवश हो रही है।

तेजस्वी यादव की विदाई की शुरुआत है प्रशांत पांडे का आगमन!

बिहार की राजनीति तेजी से करवट बदल रही है। नये लोग आ रहे हैं तो पुराने लोगों के अस्तित्व पर संकट गहरा रहा है। बांकीपुर जैसी सीट पर भाजपा चुनाव हार जा रही है और राजद जैसी पार्टी चुनाव का खानापूर्ति करने को विवश हो रही है। यह ट्रेंड बता रहा है कि वोटर अब बदलाव के मूड में है। जातीय दायरों में बंधा वोटर अब खांचा बदलने को तैयार को है। नये जातीय समीकरण की शुरुआत हो रही है। इसकी दिशा क्या होगी, अभी स्पष्ट नहीं है। लेकिन इतना तय है कि इस बदलाव में सबसे ज्यादा नुकसान राजद को होने वाला है।

हम बांकीपुर उपचुनाव में प्रशांत पांडे की जीत के बाद की संभावनाओं पर संवाद कर रहे हैं। प्रशांत पांडे की जीत ओबरा से सोमप्रकाश सिंह, चकाई से सुमित सिंह या अन्य निर्दलीय उम्मीदवार की जीत के समान नहीं है। सोमप्रकाश सिंह या सुमित सिंह की जीत एक विधान सभा क्षेत्र विशेष में एक व्यक्ति की जीत तक सीमित रह गया था, क्योंकि उनकी जीत के साथ कोई वैचारिक अवधारणा नहीं थी और न बदलाव की आकांक्षा। लेकिन प्रशांत पांडेय की जीत के साथ एक नये समीकरण की संभावना पैदा हुई है, एक नयी आकांक्षा का जन्म हुआ है। 

बांकीपुर की बात करें तो राजपूत, कोईरी और बनिया का 90 फीसदी वोट भाजपा के साथ गया था, जबकि 35-40 प्रतिशत वोट ही भूमिहारों का भाजपा को गया था। इसकी वजह थी कि सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने से सबसे ज्यादा गुस्से में भूमिहार जाति ही है। उसे लग रहा है कि उनके आगे से निवाला छीन लिया गया है। ब्राह्मणों  को नया नेता मिलता दिख रहा है, लेकिन उसने भाजपा से मुंह मोड़ने का जोखिम अभी नहीं उठाया है। इसलिए 70 प्रतिशत से ज्यादा वोट ब्राह्मणों ने भाजपा को ही दिया। 

दरअसल इस चुनाव में सबसे ज्यादा संशय में रहा राजद का आधार वोट। यादव और मुसलमानों में तेजस्वी यादव के नेतृत्व को लेकर भरोसा डिग रहा है, लेकिन सवाल है कि राजद के अंदर कोई विकल्प नहीं दिख रहा है। इसलिए उसने राजद के बाहर अपने लिए नयी जमीन की तलाश की शुरुआत की है। प्रशांत पांडे के रूप में उसे नया विकल्प दिखा। बिहार की राजनीति में यादव का राजनीतिक विरोध भूमिहारों और राजपूतों से रहा है, जबकि यादवों का ब्राह्मणों  के साथ कोई सामाजिक टकराव नहीं रहा है। इसलिए प्रशांत पांडे के नाम पर यादवों को ज्यादा परेशानी भी नहीं हो रही है। जब यादव राजद को छोड़ने को तैयार है तो मुसलमानों को भी तेजस्वी को ढोने में कोई रुचि नहीं रह जाएगी। 

दरअसल यही स्थिति तेजस्वी यादव के लिए खतरनाक है। उन्हें अब तक लगता था कि यादव और मुसलमानों का 30-32 प्रतिशत वोट उनका बंधुआ है। इसलिए राजद का राजनीतिक अस्तित्व और औचित्य बना रहेगा। लेकिन बांकीपुर विधान सभा उपचुनाव में यादव और मुसलमानों ने राजद का जुआठ अपने कंधों से उतार कर फेंक दिया है। हम यह नहीं मानते हैं कि वह प्रशांत पांडे के जुआठ का स्थायी हिस्सा हो गया है, लेकिन इतना तय है कि तेजस्वी यादव अपना नाधा और पगहा ठीक से नहीं बांध पाये तो जुआठ को जमीन पर आने में देर नहीं लगेगी। 

बिहार का दुर्भाग्य है कि नीतीश राज में कभी प्रतिपक्ष विपक्ष की भूमिका में नहीं रहा। वह सत्ता के साथ समन्वय बनाने में अपनी ऊर्जा खपता रहा। इसलिए प्रतिपक्ष 25 विधायकों वाला दल हो या 75 विधायकों वाला, मुर्दा ही बना रहा। मुर्दों में जान फूंकने की बारी आयी तो सांस फुल रहा है। इसलिए प्रशांत पांडे का रास्ता आसान हो गया है। बांकीपुर की जीत किसी पार्टी या व्यक्ति की जीत नहीं है, बल्कि नयी आकांक्षा, नयी उम्मीद और नये भरोसे की जीत है, जिसे बिहार के राजनीतिक माहौल में प्रशांत ने पैदा किया है। 

प्रशांत किशोर के उभार का सबसे ज्यादा नुकसान राजद हो होने वाला है, क्योंकि तेजस्वी यादव ने अपने वोटरों का भरोसा खो दिया है। बांकीपुर ने तेजस्वी यादव की राजनीतिक विदाई की पटकथा लिख दी है। वोटरों को अब नये राजनीतिक समीकरण में नयी भूमिका की तलाश करनी है। तेजस्वी यादव से अब बिहार को नयी भूमिका की उम्मीद नहीं करनी चाहिए।

अनूप नारायण सिंह 

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