बैजनाथ राम के प्रस्तावक बने हेमंत सोरेन, प्रणव झा और नाथवानी ने भी दाखिल किया पर्चा

बैजनाथ राम के प्रस्तावक बने हेमंत सोरेन, प्रणव झा और नाथवानी ने भी दाखिल किया पर्चा

बैजनाथ राम के प्रस्तावक बने हेमंत सोरेन, प्रणव झा और नाथवानी ने भी दाखिल किया पर्चा
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By : स्वराज पोस्ट | Edited By: Urvashi
: Jun 08, 2026, 1:48:00 PM

झारखंड की दो राज्यसभा सीटों के लिए होने वाले चुनाव ने अब राजनीतिक रूप से दिलचस्प मोड़ ले लिया है। नामांकन प्रक्रिया पूरी होने के साथ ही सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों अपने-अपने दावों के साथ मैदान में उतर चुके हैं। सोमवार को झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के उम्मीदवार बैजनाथ राम, कांग्रेस प्रत्याशी प्रणव झा और भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी ने नामांकन पत्र दाखिल किया। इसके बाद चुनावी गणित, संभावित क्रॉस वोटिंग और राजनीतिक रणनीतियों को लेकर चर्चाओं का दौर तेज हो गया है।

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने बैजनाथ राम के प्रस्तावक के रूप में नामांकन प्रक्रिया में हिस्सा लिया, जबकि कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा के प्रस्तावक राष्ट्रीय जनता दल के विधायक रहे। नामांकन के बाद दोनों गठबंधन प्रत्याशियों ने अपनी जीत को लेकर भरोसा जताया। प्रणव झा ने कहा कि विधानसभा में संख्याबल उनके पक्ष में है और किसी भी तरह के बाहरी प्रभाव की संभावना नहीं है। वहीं बैजनाथ राम ने दावा किया कि महागठबंधन दोनों सीटों पर विजय हासिल करेगा।

निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी ने नामांकन के बाद खुद को झारखंड से गहराई से जुड़ा हुआ बताया। उन्होंने कहा कि राज्य में लंबे समय से सक्रिय रहने के कारण उनका सभी राजनीतिक दलों के नेताओं से संवाद रहा है। नाथवानी ने कहा कि उन्हें अवसर मिला तो वे पहले से अधिक सक्रिय होकर राज्य के विकास के लिए काम करेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी उम्मीदवारी किसी एक दल तक सीमित नहीं है और उन्हें अपनी जीत को लेकर पूरा विश्वास है। उनके नामांकन के दौरान भाजपा के विधायक भी मौजूद रहे।

चुनावी मुकाबले के बीच राजनीतिक विमर्श भी तेज हो गया है। झामुमो की ओर से यह मुद्दा प्रमुखता से उठाया जा रहा है कि बैजनाथ राम राज्य के स्थानीय और दलित समाज से आने वाले नेता हैं। पार्टी के वरिष्ठ नेता सुप्रियो भट्टाचार्य ने भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा कि नामांकन दाखिल करना और चुनाव जीतना अलग-अलग बातें हैं। उन्होंने दावा किया कि झामुमो ने सामाजिक प्रतिनिधित्व को प्राथमिकता देते हुए ऐसे उम्मीदवार को मैदान में उतारा है जो राज्य की जमीनी पहचान का प्रतिनिधित्व करता है।

भट्टाचार्य ने यह भी आरोप लगाया कि विपक्ष चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए संसाधनों के इस्तेमाल की रणनीति पर काम कर रहा है। उनके अनुसार गठबंधन ने सामाजिक और राजनीतिक संतुलन को ध्यान में रखकर उम्मीदवार का चयन किया है।

राज्यसभा चुनाव के अंकगणित पर नजर डालें तो परिमल नाथवानी के सामने सबसे बड़ी चुनौती आवश्यक समर्थन जुटाने की है। माना जा रहा है कि उन्हें भाजपा और उसके सहयोगी विधायकों का समर्थन प्राप्त है, लेकिन जीत के लिए अभी भी अतिरिक्त वोटों की जरूरत पड़ सकती है। यही कारण है कि राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि क्या किसी दल या विधायक के रुख में बदलाव देखने को मिलेगा।

विश्लेषकों का मानना है कि यदि नाथवानी आवश्यक समर्थन हासिल कर लेते हैं, तो इसे विधानसभा के भीतर विपक्ष की रणनीतिक सफलता माना जाएगा। वहीं यदि वे लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाते हैं, तो महागठबंधन की एकजुटता और उसके संख्याबल की पुष्टि होगी।

नामांकन प्रक्रिया पूरी होने के बाद अब सभी की निगाहें मतदान तक की राजनीतिक गतिविधियों पर टिकी हैं। सत्ता पक्ष अपनी संख्या को सुरक्षित मानकर चल रहा है, जबकि विपक्ष संभावित समर्थन जुटाने की कोशिशों में लगा है। ऐसे में राज्यसभा चुनाव केवल दो सीटों का चुनाव नहीं रह गया है, बल्कि यह विधानसभा के भीतर राजनीतिक निष्ठाओं, गठबंधन की मजबूती और विपक्ष की रणनीति की भी परीक्षा बन गया है।

आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि झारखंड की राजनीति में सामाजिक प्रतिनिधित्व का मुद्दा अधिक प्रभावी साबित होता है या फिर विपक्ष अपनी राजनीतिक गणित के सहारे चुनावी तस्वीर बदलने में सफल रहता है। फिलहाल राज्यसभा चुनाव ने राज्य के राजनीतिक माहौल को पूरी तरह से गरमा दिया है।