“35 दिन की समय-सीमा बेअसर: बिहार में हजारों जमीन मामले अब भी लंबित”

बिहार में जमीन से जुड़े मामलों को लेकर सरकार एक तरफ पूरी तरह सख्त नजर आ रही है, लेकिन दूसरी तरफ जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। बिहार के डिप्टी सीएम और राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री विजय कुमार सिन्हा लगातार बैठक पर बैठक कर रहे हैं

“35 दिन की समय-सीमा बेअसर: बिहार में हजारों जमीन मामले अब भी लंबित”
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By : स्वराज पोस्ट | Edited By: Karishma Singh
: Dec 31, 2025, 12:37:00 PM

बिहार में जमीन से जुड़े मामलों को लेकर सरकार एक तरफ पूरी तरह सख्त नजर आ रही है, लेकिन दूसरी तरफ जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। बिहार के डिप्टी सीएम और राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री विजय कुमार सिन्हा लगातार बैठक पर बैठक कर रहे हैं, अफसरों को अल्टीमेटम दे रहे हैं, समय-सीमा तय कर रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद हालात ऐसे हैं मानो अधिकारियों को किसी निर्देश की कोई परवाह ही नहीं है। यही वजह है कि अब यह पूरा मामला मीडिया में सुर्खियां बन रही है।

पटना जिले का ही आंकड़ा देख लीजिए। जिले में आज भी 17,242 दाखिल-खारिज और 9,163 परिमार्जन मामले लंबित हैं। यानी हजारों लोग अपने ही जमीन के कागज दुरुस्त कराने के लिए महीनों से सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं। सरकार कहती है 35 दिन में निपटान अनिवार्य है, लेकिन सच्चाई यह है कि सैकड़ों मामले 75 दिन, तो दर्जनों मामले 120 दिन से भी ज्यादा समय से फंसे पड़े हैं।

डिप्टी सीएम विजय सिन्हा साफ कह चुके हैं—अब ढिलाई नहीं चलेगी। लगातार समीक्षा बैठकें हो रही हैं, अंचल अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए गए हैं, छुट्टियां तक रद्द कर दी गई हैं। लेकिन इसके बावजूद आंकड़े बता रहे हैं कि अफसरशाही पर सख्ती का कोई असर नही दिख रहा है।

परिमार्जन मामलों की बात करें तो सबसे ज्यादा लंबित केस धनरुआ, फुलवारीशरीफ, बिहटा, नौबतपुर, संपतचक और दानापुर जैसे अंचलों में हैं। कुछ अंचलों में एक-एक हजार से ज्यादा मामले पेंडिंग हैं। सवाल सीधा है—जब सरकार हर स्तर पर दबाव बना रही है, तो फिर ये फाइलें आगे क्यों नहीं बढ़ रहीं?

प्रशासन का तर्क है कि जमीन से जुड़े मामलों का शीघ्र निपटान सिर्फ कागजी काम नहीं, बल्कि आम लोगों को राहत देने का सीधा माध्यम है। जमीन का दाखिल-खारिज रुका है, तो न खरीद-बिक्री हो पा रही है, न बैंक से लोन, न सरकारी योजनाओं का लाभ। यानी एक फाइल की देरी, पूरे परिवार की परेशानी बन जाती है।

जिलाधिकारी स्तर से भी सख्त संदेश दिया गया है। सभी डीसीएलआर को आदेश है कि दाखिल-खारिज, परिमार्जन, नापीवाद और सरकारी जमीन से जुड़े मामलों का पूरा ब्योरा पेश करें। जिन अंचलों ने जानकारी नहीं दी, उनके सीओ और राजस्व कर्मियों पर कार्रवाई की चेतावनी दी जा चुकी है। इसके बावजूद सवाल वही—कार्रवाई जमीन पर कब दिखेगी?

राजनीतिक संदेश बिल्कुल साफ है। डिप्टी सीएम विजय सिन्हा इस मुद्दे पर कोई नरमी बरतने के मूड में नहीं हैं। लेकिन अफसरों की कार्यशैली यह संकेत दे रही है कि या तो आदेशों को हल्के में लिया जा रहा है, या फिर सिस्टम के भीतर ही कहीं बड़ी गड़बड़ी है।

अब देखना यह है कि सरकार की सख्ती सच में अफसरशाही को हिलाती है या फिर यह पूरा मामला सिर्फ बैठकों और चेतावनियों तक सिमट कर रह जाता है। अगर समय पर लंबित मामलों का निपटान नहीं हुआ, तो तय है—आगे सिर्फ चेतावनी नहीं, सीधी कार्रवाई होगी।

यानी बिहार में जमीन का यह मसला अब सिर्फ फाइलों का नहीं रहा, यह  सरकार बनाम अफसर का हो गया है।