राष्ट्रपति और राज्यपालों की विधेयकों पर कार्रवाई की समय-सीमा को लेकर सुप्रीम कोर्ट आज देगा अहम राय

राष्ट्रपति और राज्यपालों की विधेयकों पर कार्रवाई की समय-सीमा को लेकर सुप्रीम कोर्ट आज देगा अहम राय

सुप्रीम कोर्ट गुरुवार को संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत राष्ट्रपति द्वारा भेजे गए रेफरेंस पर अपना महत्वपूर्ण निर्णय सुनाने जा रहा है। इस रेफरेंस में पूछा गया है कि क्या राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित बिलों पर कार्रवाई को लेकर राज्यपालों के लिए समय-सीमा तय की जा सकती है, जबकि संविधान में इसके लिए कोई स्पष्ट टाइम लिमिट निर्धारित नहीं है।

चीफ जस्टिस बी.आर. गवई की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने 11 सितंबर को केंद्र के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और विभिन्न विपक्ष शासित राज्यों—जैसे तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, केरल, कर्नाटक, तेलंगाना, पंजाब और हिमाचल प्रदेश—की ओर से 10 दिनों तक चली सुनवाई के बाद निर्णय सुरक्षित रख लिया था। कई राज्यों ने राष्ट्रपति के इस रेफरेंस का विरोध किया था।

जुलाई में पांच जजों की बेंच ने ‘इन री: असेंट, विदहोल्डिंग ऑर रिजर्वेशन ऑफ बिल्स…’ शीर्षक वाले मामले में केंद्र और राज्यों से जवाब मांगा था। यह मामला तमिलनाडु में बिलों की मंजूरी को लेकर उठे विवाद के बाद सामने आया था। इसी के बाद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सुप्रीम कोर्ट से अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपालों के विकल्पों पर मार्गदर्शन मांगा।

इससे पहले अप्रैल 2025 में दो जजों की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत हस्तक्षेप करते हुए तमिलनाडु सरकार और राज्यपाल आर.एन. रवि के बीच बिलों की मंजूरी को लेकर उत्पन्न गतिरोध को दूर किया था। कोर्ट ने कहा था कि 10 बिलों को मंजूरी देने से गवर्नर का इनकार मनमाना और असंवैधानिक था। पीठ ने राष्ट्रपति और गवर्नर द्वारा दोबारा भेजे गए बिलों पर तीन महीने की समय-सीमा तय कर दी थी। यह भी स्पष्ट किया गया कि अगर इस अवधि में फैसला नहीं होता है, तो राज्य राष्ट्रपति के विरुद्ध रिट याचिका दायर कर सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने विशेषाधिकारों का इस्तेमाल करते हुए इन 10 बिलों को उसी दिन से मंजूर माना, जिस दिन उन्हें विधानसभा ने दोबारा पारित कर गवर्नर के पास भेजा था। साथ ही यह भी कहा गया कि दोबारा भेजे जाने के बाद गवर्नर उन्हें राष्ट्रपति के लिए रिजर्व नहीं कर सकते।

इस फैसले ने पहली बार बिल मंजूरी की समय-सीमा तय करते हुए राष्ट्रपति के कार्यों को न्यायिक समीक्षा के दायरे में ला दिया, जिसके आधार पर राष्ट्रपति ने अनुच्छेद 143 का सहारा लेकर सुप्रीम कोर्ट से सलाह मांगी।

रेफरेंस में पूछा गया है कि क्या अनुच्छेद 200 के तहत बिलों पर विचार करते समय गवर्नर मंत्रिपरिषद की सलाह मानने के लिए बाध्य हैं? क्या गवर्नर अपने “विवेक” का इस्तेमाल कर सकते हैं, जबकि अनुच्छेद 361 उनके कार्यों पर न्यायिक समीक्षा से सुरक्षा देता है? और क्या अनुच्छेद 201 के तहत राष्ट्रपति द्वारा किए जाने वाले निर्णयों पर न्यायालय किसी प्रकार की समय-सीमा या दिशा-निर्देश तय कर सकता है?

इन सभी संवैधानिक सवालों पर सुप्रीम कोर्ट आज अपनी सलाह देगा।


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